अब से कुछ ही घंटे के भीतर चंद्रमा की सतह पर चंद्रयान के लैंडर की लॉन्चिंग होने वाली है। सफलतापूर्वक होने वाली सिलेंडर की लांचिंग के साथ ही उसके भीतर से रोवर उतरकर चंद्रमा की सतह पर निकलेगा। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि रोवर के चांद पर उतरते ही कुछ घंटे तक सब "ब्लैंक" होने वाला है। दरअसल सफलतापूर्वक होने वाली लॉन्चिंग के बाद कुछ घंटे तक होने वाला यह "ब्लैंक" किसी तकनीकी खराबी की वजह से नहीं बल्कि चंद्रमा की सतह पर लैंडिंग होने के बाद वहां हुई हलचल और उससे उठने वाली धूल के चलते होगा। उसके बाद रोवर की सात दिनों की चाल चंद्रमा के तमाम अनसुलझे रहस्यों को खोलने के लिए बहुत पर्याप्त होगी। हालांकि रोवर की सक्रिय उम्र चंद्रमा पर 14 दिन की ही तय है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि वैसे तो लैंडर जब चंद्रमा की सतह पर उतरेगा तो उसकी गति तकरीबन शून्य सी हो जाएगी। बावजूद इसके सफलतापूर्वक हुई लॉन्चिंग के साथ जो चंद्रमा की सतह पर हलचल मचेगी। इसी हलचल के कुछ अंतराल बाद रोवर लैंडर से निकलकर चंद्रमा की सतह को छुएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि लांचिंग के दौरान होने वाली हलचल से चंद्रमा की सतह पर जबरदस्त धूल उड़ेगी। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ संदीप सहजपाल कहते हैं कि चंद्रमा पर पहले से ही बहुत धूल उड़ती है। यह धूल न सिर्फ 'इलेक्ट्रिकली चार्ज्ड' होती बल्कि इतनी 'सॉलिड' होती है कि यह चिपकती भी बहुत ज्यादा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐसी दशा में लैंडर की लैंडिंग के वक्त न सिर्फ अप्रत्याशित धूल उड़ेगी वह भेजे गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर भी चिपकेगी। ऐसी दशा में भेजे गए उपकरणों से तुरंत संदेश लेना संभव नहीं हो सकेगा।
वैज्ञानिकों के मुताबिक लैंडिंग के वक्त होने वाली हलचल और उड़ने वाली धूल को सामान्य होने में कई घंटे लग सकते हैं। एक अनुमान के मुताबिक तकरीबन चार घंटे के भीतर इस धूल के कण धीरे-धीरे 'सेटल' होने लगते हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि जितनी देर तक चंद्रमा की सतह पर लैंडिंग के बाद धूल के कण उड़ेंगे उतनी देर तक सब कुछ 'ब्लैंक' जैसा ही रहेगा। हालांकि इस दौरान सकुशल लैंडिंग होने के बाद जितने भी उपकरण होंगे वह पूरी तरीके से तकनीकी रूप से उतने ही सक्षम होंगे जितने की धूल के कण बैठने के बाद काम करना शुरू करेंगे। वैज्ञानिकों के मुताबिक क्योंकि चंद्रमा की सतह पर जो धूल उड़ती है उसकी गति भी ज्यादा होती है और उसका घनत्व भी ज्यादा होता है। ऐसी दशा में धूल के कणों के बैठने में 4 घंटे से भी ज्यादा का वक्त लग सकता है। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ संदीप सहजपाल कहते हैं कि चंद्रमा पर सफलतापूर्वक लॉन्चिंग के बाद रोवर के पास 14 दिन का सक्रिय रहने का भरपूर वक्त होगा। धूल के कणों के सामान्य होने के बाद रोवर चंद्रमा के अनसुलझे रहस्यों को खंगालना शुरू करेगा।
वैज्ञानिकों का कहना है कि वैसे तो रोवर के लिए चंद्रमा पर धरती के मुताबिक 14 दिन का सक्रिय वक्त रहेगा। लेकिन इन 14 दिनों में शुरुआत के दिन महत्वपूर्ण होंगे। वरिष्ठ वैज्ञानिक संदीप सहजपाल मानते हैं कि शुरुआत के सात दिनों के भीतर सूचनाएं रोवर के माध्यम से इसरो को भेजी जाएंगी। ये सूचनाएं चंद्रमा के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने के लिए वैज्ञानिक शोध का विषय बनेंगी। हालांकि बाद के भी 7 दिन उतने ही महत्वपूर्ण होंगे जितने कि शुरुआत के होंगे। वह कहते हैं कि मिशन चंद्रयान के माध्यम से मिलने वाली सूचनाएं सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि समूची दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण होने वाली हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि रोवर भले ही चंद्रमा की सतह पर चौदह दिनों में महज पांच सौ मीटर ही चलेगा लेकिन वह इतनी दूरी में चंद्रमा की उत्पत्ति से लेकर अब तक के तमाम अनसुलझे रहस्यों की जानकारी ले लेगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक चंद्रमा पर लैंडिंग के साथ टेक्नोलॉजी की न सिर्फ सफल टेस्टिंग होगी बल्कि चंद्रमा के केमिकल कंपोजिशन की भी पूरी जानकारी मिलनी शुरू हो जाएगी। वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रोफेसर सहजपाल कहते हैं कि चंद्रमा पर रोवर की मौजूदगी से जो सूचनाएं मिलने वाली है वह चंद्रमा की उन सभी जानकारियों को पूरा करने में मदद करेंगी जिसके बारे में अभी संपूर्ण जानकारी नहीं हो सकी है। उनका कहना है कि इसमें चंद्रमा की उत्पत्ति से लेकर वहां के मौसम और गुरुत्वाकर्षण समेत भविष्य के वैज्ञानिक शोध को पूरा करने में महज पांच सौ मीटर की दूरी तक चलने वाले रोवर से ज्यादा से ज्यादा जानकारियां इकट्ठी की जा सकेंगी।
जैसे-जैसे मिशन चंद्रयान के पूरे होने की घड़ियां नजदीक आती जा रही हैं समूचे देश ही नहीं बल्कि दुनिया की निगाहें इसरो की ओर से मिलने वाली पल-पल की अपडेट पर बनी हुई है। वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रोफेसर संजीव सहजपाल कहते हैं कि जब चंद्रमा की सतह पर लैंडर उतर रहा होगा तो उसकी स्पीड एक तरह से शून्य ही होगी। उनका कहना है कि वैसे तो चंद्रयान में यह स्पीड दो से एक मीटर प्रति सेकंड की होती है लेकिन चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण इसकी प्रोग्रामिंग और प्रणाली ऐसी होती है कि यह सतह पर पहुंचते ही शून्य हो जाए। प्रोफेसर सहजपाल का कहना है कि जैसे-जैसे लैंडर चंद्रमा की सतह के नजदीक आता जाएगा उसकी गति सबसे महत्वपूर्ण होती जाएगी। क्योंकि चंद्रमा के जिस हिस्से पर लैंडर उतरने वाला है वहां की सतह सामान्य जैसी नहीं है। इसलिए अनुमानित गति उतरते वक्त 2 मीटर प्रति सेकंड की होगी।