अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी ने कमर कस ली है। पार्टी ने सभी छोटे दलों के लिए गठबंधन के दरवाजे खोल दिए हैं, जिसमें राष्ट्रीय लोक दल, आम आदमी पार्टी, ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से लेकर अपना दल तक का स्वागत हो रहा है। गठबंधन के लिए अखिलेश यादव की रालोद के अध्यक्ष जयंत चौधरी और आम आदमी पार्टी के यूपी प्रभारी संजय सिंह से बात हो चुकी है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी पहले ही गठबंधन का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के लिए सपा के दरवाजे तो क्या खिड़कियां तक बंद है।
पर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के एक न्यूज चैनल को दिए बयान ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या ओवैसी भी इस गठबंधन का हिस्सा बनने जा रहे हैं? मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक राजभर ने कथित तौर पर कहा है किओवैसी भी सपा के साथ गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राजभर ने कहा ओवैसी चुनाव में अखिलेश के साथ आ सकते हैं, लेकिन उन्हें 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग छोड़नी होगी। 10 सीट पर लड़ना है तो बताइए फिर बात करें'। हालांकि कुछ ही दिनों पहले अखिलेश यादव ओवैसी के साथ किसी भी तरह के गठबंधन से मना कर चुके हैं।
चुनाव में भाजपा को हराने के लिए जब अखिलेश सभी छोटी पार्टियों को साथ लेकर सभी समीकरण दुरुस्त करने में जुटे हैं लेकिन अभी तक ओवैसी से दूरी बनाए हुए हैं। आखिर इसकी वजह क्या है? पार्टी नेता इसके इसके पीछे की वजह यह बताते हैं कि समाजवादी पार्टी अपनी 'मुस्लिम पार्टी' की छवि को मिटाने की कोशिश कर रही है। पार्टी के नेताओं का तर्क यह है कि हमें एक ऐसी पार्टी के रूप में देखा जाता है जिसे केवल यादव और मुस्लिमों का समर्थन हासिल है, इससे भाजपा की हिंदुत्व की एजेंडे को बल मिल रहा था और पार्टी चुनाव हार रही थी।
जानकार बताते हैं कि यूपी में करीब 20 फीसदी मुस्लिम आबादी है और राज्य की करीब 143 सीटों पर मुस्लिम वोट बैंक का प्रभाव है। अब तक सपा एम-वाई समीकरण यानी यादव और मुसलमान वोट बैंक सपा की जीत का आधार रहा है। लेकिन 2014 के बाद से भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे के आगे सपा का यह समीकरण गड़बड़ाया तो पार्टी को रणनीति बदलनी पड़ी।