14 फरवरी को पुलवामा आतंकी हमले के बाद से ही एक और सर्जिल स्ट्राइक की तैयारियां शुरू हो गई थीं। इस बार खासतौर पर यह जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना को सौंपी गई थी। भारत सरकार चाहती थी कि पाकिस्तान को इस बार जोरदार जवाब देने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक जमीन पर करने की बजाय आसमान से की जाए, ताकि कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा नुकसान किया जा सके।
रक्षा मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक बेहद लंबी चली थी, और उसमें सरकार को आशंका दी कि कहीं कोई बड़ा नुकसान न हो जाए, हालांकि सरकार मिशन को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थी। साथ ही इस बार पाकिस्तान बेहद चौकन्ना था और उसे अंदेशा था कि भारत बदले की कार्रवाई जरूर करेगा। वहीं सरकार चाहती थी कि इस बार की सर्जिकल स्ट्राइक कम वक्त में हो जाए और ज्यादा से ज्यादा नुकसान किया जाए। सूत्र बताते हैं कि जमीनी पर सर्जिकल स्ट्राइक करने पर इतनी मात्रा में गोला बारूद ले जाना संभव नहीं था और लिहाजा जमीन से सर्जिकल स्ट्राइक के विकल्प को छोड़ दिया गया और एयर स्ट्राइक के विकल्प को चुना गया ताकि मात्र 30 मिनट में ही हजारों किलोग्राम के बम बरसा कर मिशन को अंजाम दे दिया जाए।
इससे पहले 17 फरवरी से पोखरण में चले तीन दिवसीय वायु शक्ति अभ्यास के दौरान वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि पॉलिटिकल लीडरशिप जो भी जिम्मेदारी देगी उसे वायुसेना कहीं भी और कभी भी अच्छी तरह निभाने के लिए एयरफोर्स पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि हम हर मिशन को पूरा करने में सबसे आगे रहेंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि इस अभ्यास से साबित होता है कि यह हमारी क्षमता को दिखाता है कि कैसे वायुसेना कितनी तेजी और सटीकता के साथ रात में, दिन में और प्रतिकूल मौसम में भी हमला कर सकती है।
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक सर्जिकल स्ट्राइक 2.0 के लिए वायुसेना को तैयारी करने को कहा गया था। इसके लिए पुलवामा अटैक के ठीक दूसरे दिन यानी 15 फरवरी को सुबह साढ़े नौ बजे भारतीय वायु सेना प्रमुख बीएस धनोआ ने पुलवामा अटैक का मुहंतोड़ जवाब देने के लिए हवाई हमले की प्रेजेंटेशन दी, जिसे सरकार ने मंजूर कर लिया। इस बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी शामिल थे।
सरकार से मंजूरी मिलने के बाद 16 से 20 फरवरी तक भारतीय वायुसेना और भारतीय सेना ने मिल कर लाइन ऑफ कंट्रोल पर हेरॉन ड्रोन के जरिए हवाई निगरानी कराई, जिसके बाद 20 से 22 फरवरी तक खुफिया एजेंसियों ने वायुसेना के साथ मिलकर एलओसी पर उन जगहों को चिन्हित किया, जहां पर एयर स्ट्राइक की जा सकती है। जिसके बाद यह प्लान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के सामने पेश किया गया और उनकी रजामंदी ली गई।
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान को इस सर्जीकल स्ट्राइक की भनक तक न लगे इसके लिए उसका ध्यान भटकाया गया। इस रणनीति के तहत 21 फऱवरी को सियालकोट के पास बॉर्डर पर भारतीय लड़ाकू विमानों को उड़ाया गया, जिसके बाद पाकिस्तान में हड़कंप मच गया और पाकिस्तान ने सियालकोट एयरबेस पर सुरक्षा चाकचौबंद करते हुए अपने एफ-16 विमान की तादाद बढ़ा दी। सूत्रों का कहना है कि रणनीति कामयाब हुई और पाकिस्तान इस गफलत में रहा है कि कार्रवाई इसी तरफ से होगी।
इस रणनीति के बाद 22 फरवरी को भारतीय वायुसेना के दो मिराज स्क्वाड्रन यानी 12 मिराज 2000 के अलावा को मिशन को अंजाम देने के लिए तैयार रहने को कहा गया। वहीं 24 फरवरी को इस एयर स्ट्राइक तैयारी का बकायदा एक ट्रायल भी किया गया। इसके लिए 24 फरवरी को भटिंडा से वार्निंग जेट और आगरा से मिड एयर रिफ्यूलर के साथ देश के भीतर ही एयर स्ट्राइक का एक ट्रायल किया गया।
वहीं सरकार में भी डिप्लोमेटिक स्तर तैयारियां पर चल रही थीं, ताकि पाकिस्तान के साथ बाकी देशों को भी भरोसे में लिया जा सके। इसके लिए 25 फरवरी को श्रीनगर-मुजफ्फराबाद बस सेवा ‘ कारवां-ए-अमन ’ को फिर से बहाल किया गया। इस बस सेवा को पुलवामा अटैक के बाद बंद कर दिया गया था। यह बस पाक अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद तक जाती है। इस बस सेवा शुरू होने के बाद पाकिस्तान बिल्कुल रिलेक्स की स्थिति यानी कंफरटेबल जोन में आ गया और उसे भरोसा हो गया कि भारत पीओके की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं करेगा।