देश के जंगलों, पहाड़ों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले जनजातीय समुदायों के जीवन में अब तकनीक बड़ा बदलाव ला रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई अब उन भाषाओं में भी काम कर रही है, जिन्हें लंबे समय तक मुख्यधारा से दूर माना जाता था। सरकार का दावा है कि अब तकनीक सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों और आदिवासी इलाकों तक पहुंच रही है। जनजातीय गरिमा उत्सव के जरिए सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि विकसित भारत का सपना तभी पूरा होगा, जब देश का अंतिम व्यक्ति भी विकास से जुड़ेगा। अब एआई जनजातीय भाषाओं में बात करेगा, योजनाओं की जानकारी देगा और लोगों की समस्याओं का समाधान भी बताएगा।
जनजातीय विकास में तकनीक को क्यों माना जा रहा अहम?
सरकार का कहना है कि जनजातीय विकास के लिए सिर्फ योजनाएं बनाना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना जरूरी है। प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महा अभियान, धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान और राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन जैसी योजनाएं अब 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 549 जिलों तक पहुंच चुकी हैं। इन योजनाओं के जरिए 63 हजार से ज्यादा गांवों के करीब 5.5 करोड़ जनजातीय नागरिकों को लाभ मिल रहा है। सरकार का फोकस विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों पर है, ताकि उन्हें आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल सकें।
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डाटा और डिजिटल प्लेटफॉर्म से कैसे हो रहा काम?
इतने बड़े और दूरदराज इलाकों में योजनाओं को लागू करने के लिए सरकार तकनीक का सहारा ले रही है। डाटा आधारित डिजिटल सिस्टम तैयार किए गए हैं, जिनकी मदद से हर परिवार तक पहुंचने की कोशिश हो रही है। पीवीटीजी प्लेटफॉर्म के जरिए 18 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में काम चल रहा है। अब तक 8552 सर्वेक्षकों की मदद से 3.43 लाख परिवारों का डाटा दर्ज किया जा चुका है। सरकार का मानना है कि इससे जरूरतमंद परिवारों की पहचान आसान होगी और योजनाओं का लाभ तेजी से पहुंच सकेगा।
स्वास्थ्य क्षेत्र में तकनीक से क्या बदलाव आ रहा है?
जनजातीय इलाकों में सिकल सेल बीमारी लंबे समय से बड़ी समस्या रही है। अब भारत ने इसके इलाज के लिए ‘बिरसा 101’ नाम की पहली स्वदेशी सीआरआईएसपीआर आधारित जीन थेरेपी विकसित की है। इसे स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ा कदम माना जा रहा है। सरकार का कहना है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ शहरों के लिए नहीं बल्कि दूरदराज के आदिवासी इलाकों के लिए भी किया जा रहा है। इसके अलावा परंपरागत ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय और आयुरजीनोमिक्स जैसे प्रयासों के जरिए जनजातीय समुदायों के पारंपरिक औषधीय ज्ञान को सुरक्षित और प्रमाणित किया जा रहा है।
क्या तकनीक से जनजातीय संस्कृति को भी मिलेगा फायदा?
सरकार का कहना है कि तकनीक अब जनजातीय संस्कृति और कला को नई पहचान देने का माध्यम बन रही है। ट्राईबेक्स नाम का डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है, जिसके जरिए जनजातीय कला, भाषा, संगीत, हस्तशिल्प और पारंपरिक ज्ञान को दुनिया तक पहुंचाया जाएगा। इसके साथ ही जनजातीय उत्पादों और कला के लिए जीआई पोटेंशियल आर्ट एंड क्राफ्ट एटलस ऑफ ट्राइबल इंडिया तैयार करने की योजना है। इसका मकसद जनजातीय उत्पादों को खास पहचान दिलाना और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच बढ़ाना है।
एआई प्लेटफॉर्म जनजातीय भाषाओं में कैसे करेगा मदद?
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में सरकार ने कई एआई आधारित प्लेटफॉर्म पेश किए। इनमें ‘आदिवाणी’ और ‘ट्राईबॉट’ सबसे ज्यादा चर्चा में रहे। आदिवाणी एक एआई आधारित अनुवादक है, जो जनजातीय भाषाओं में टेक्स्ट और आवाज के जरिए सरकारी योजनाओं की जानकारी देगा। वहीं ट्राईबॉट एक बहुभाषी एआई सहायक है, जो दूरदराज के इलाकों में लोगों को तुरंत जानकारी और शिकायत निवारण सहायता देगा। सरकार का कहना है कि अब भाषा विकास में बाधा नहीं बनेगी।
विकसित भारत के लिए क्यों अहम माना जा रहा यह बदलाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तकनीक समाज के सबसे कमजोर और दूरदराज समुदायों तक पहुंचती है, तभी उसका असली फायदा दिखता है। जनजातीय समुदायों को डिजिटल और एआई प्लेटफॉर्म से जोड़ने की कोशिश को समावेशी विकास की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे न सिर्फ जनजातीय समाज की पहचान और संस्कृति मजबूत होगी, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे। यही वजह है कि इसे विकसित भारत की दिशा में एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।
-रंजना चोपड़ा,
सचिव, जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार