गलत इस्तेमाल से विनाशकारी बन सकती है AI की ताकत
यहीं इस पूरी रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण और दूसरा पहलू सामने आता है। इस तकनीक का इस्तेमाल गलत इरादों के लिए भी किया जा सकता है। इसका सकारात्मक इस्तेमाल ऐसे बैक्टीरियोफेज तैयार करने में हो सकता है, जो हानिकारक और दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बैक्टीरिया को निशाना बनाएं। दूसरी तरफ एआई पूरे जीनोम के स्तर पर बायोलॉजिकल सिस्टम डिजाइन करने में सक्षम हो रहा है। यही क्षमता गलत हाथों में कितनी खतरनाक हो सकती है?
सबसे बड़ा डर यह है कि भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल जैविक हथियार बनाने के लिए भी किया जा सकता है। इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने खास ध्यान रखा कि बनाए गए वायरस इंसानों और पौधों की कोशिकाओं को संक्रमित न कर सकें। लेकिन चिंता यह है कि गलत लोग इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल खतरनाक वायरस बनाने या पहले से मौजूद किसी खतरनाक वायरस को और ज्यादा नुकसानदायक बनाने के लिए कर सकते हैं।
गौर करने वाली बात है कि अभी दुनिया उस स्थिति तक नहीं पहुंची है। हालांकि, जैसे-जैसे एआई के ये मॉडल और ज्यादा अच्छे, सस्ते और आसानी से उपलब्ध होंगे इन्हें इस्तेमाल करना भी आसान हो जाएगा। उस दौरान बिना ज्यादा विशेषज्ञता वाले लोग भी इनका गलत इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं। यही इस तकनीक को लेकर सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है।
इसी वजह से आने वाली चुनौती सिर्फ एआई को और ज्यादा शक्तिशाली बनाने की नहीं बल्कि यह तय करने की भी है कि उसकी ताकत की सीमाएं आखिर कहां तय की जाएं। गौर करने वाली बात है कि आज एआई की मदद से तैयार किया गया एक नया वायरस बैक्टीरिया के खिलाफ इलाज की उम्मीद पैदा कर रहा है। वहीं कल को यही तकनीक किसी और मकसद के लिए इस्तेमाल हो, इसकी गारंटी कौन देगा?
सवाल यह भी है कि जब एआई और ऑटोमेटेड लैब एक साथ काम करने लगेंगे तब इंसानी हस्तक्षेप और निगरानी कितनी रह जाएगी? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। तकनीक के विकास की रफ्तार आज के समय काफी तेज हो चुकी है। लेकिन उसके गलत इस्तेमाल से होने वाले नुकसान को रोकने की तैयारी क्या उतनी ही तेज है? यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।