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कृषि विधेयकः खुला बाजार न बिहार में सफल हुआ न अमेरिका में, फिर केंद्र को इसी से उम्मीद क्यों?

Mon, 21 Sep 2020 12:54 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • खुले बाजारों वाले अमेरिका में किसानों पर कुल कर्ज 31,28,500 करोड़ रुपये तक पहुंचा
  • एपीएमसी के बाद भी देश के 94 फीसदी किसान खुले बाजार के भरोसे, लेकिन कर्ज में पड़े किसान छोड़ रहे खेती
  • देश को जरूरत थी 42 हजार एपीएमसी मंडियों की, गठित हुईं केवल सात हजार
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कृषि क्षेत्र - फोटो : PTI (फाइल फोटो)
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विस्तार
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विपक्ष के पुरजोर विरोध के बाद भी सरकार कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 और कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 संसद में पास कराने में सफल रही। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन जाएगा।

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कृषि विशेषज्ञों का सवाल है कि किसानों के लिए खुले बाजार की जो व्यवस्था बिहार से लेकर अमेरिका-यूरोप तक के किसानों को आर्थिक सुरक्षा नहीं दे पाई, सरकार को उसी बाजार से हिंदुस्तान में उम्मीद क्यों है? अब किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस कानून के लागू होने के बाद उनके सामने क्या विकल्प रह जाएंगे? यह उन्हें आर्थिक मजबूती देगा, या जैसा कि विपक्ष दावा कर रहा है, उन्हें अपने ही खेतों में मजदूर बनाकर रख देगा?

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने अमर उजाला को बताया कि अमेरिकी और यूरोपीय किसानों के लिए लंबे समय से बाजार खुला हुआ है। यहां सरकारें अपने किसानों को प्रति वर्ष भारी सब्सिडी (इस वर्ष लगभग 18,10,806 करोड़ रुपये) भी देती हैं, लेकिन इसके बाद भी वहां किसान भारी कर्ज में डूबे हुए हैं। अमेरिकी किसानों पर कुल कर्ज 31,28,500 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। हमारे देश में बिहार ने 2006 में ही अपने यहां एपीएमसी मंडियों को खत्म कर दिया था, लेकिन आज भी बिहार के किसानों की हालत बदतर स्थिति में है। इससे लाख गुना बेहतर स्थिति में पंजाब-हरियाणा के किसान हैं जहां एपीएमसी व्यवस्था बेहतर ढंग से लागू की जा रही है।
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सरकार का तर्क है कि खुले बाजार के प्रोत्साहन से भंंडारण की बेहतर व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। इससे किसानों को फसलों की उचित कीमत मिलेगी और आवश्यक चीजों की किल्लत भी नहीं होगी। लेकिन बिहार का अनुभव बताता है कि खुला बाजार होने के बाद भी यहां व्यापारियों ने भंडारण में कोई निवेश नहीं किया। बिहार के किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए आज भी दिल्ली के बाजारों की ओर रूख करना पड़ता है।

 

94 फीसदी किसान गरीब क्यों

कृषि मामलों पर गठित शांताकुमार कमेटी के मुताबिक देश के किसानों का केवल छह फीसदी एपीएमसी मंडियों से एमएसपी का लाभ उठा पाता है। यानी शेष 94 फीसदी किसान आज भी खुले बाजार के ही भरोसे हैं। देश में लगभग 42 हजार एपीएमसी मंडियों की आवश्यकता थी, लेकिन आज तक लगभग सात हजार मंडियां ही स्थापित की जा सकीं। यही कारण है कि आज भी 94 फीसदी किसान खुले बाजार के भरोसे पड़ा हुआ है।

अगर खुली बाजार व्यवस्था बहुत अच्छी होती तो इन 94 फीसदी किसानों की हालत बेहतर होती। लेकिन यह वर्ग न सिर्फ भारी कर्ज में डूबा हुआ है, बल्कि किसानी ही छोड़ रहा है। इससे स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यह व्यवस्था उन्हें आर्थिक सुरक्षा देने में नाकाम रही है। ऐसे में सवाल है कि अगर यह पूरे देश के लिए भी लागू हो गया तो यह बाकी किसानों के लिए लाभकारी कैसे हो जाएगा? विशेषज्ञ इसी मुद्दे पर सरकार के इरादे पर सवाल उठा रहे हैं। ओएससीबी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के किसानों को पिछलेे कुछ वर्षों में 42 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।

क्या हो सकता है समाधान

देविंदर शर्मा कहते हैं कि कोरोना काल में जब देश के बड़े-बड़े सेक्टर ध्वस्त हो गए, केवल कृषि क्षेत्र ने ही देश को उम्मीद बंधाए रखा। यह अकेला सेक्टर है जहां बढ़ोतरी दर्ज की गई। ग्रामीण क्षेत्रों में ही अन्य चीजों की मांंग में भी बढ़ोतरी हुई। इस सेक्टर में आज भी देश के लगभग 60 करोड़ लोग प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं। चाहे कृषि सब्सिडी के सहारे, या डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर के जरिए, अगर इन किसानों के हाथों में पैसा पहुंचाकर इनकी क्रयशक्ति बढ़ाई जाती, तो इससे बाजार में सभी उत्पादों की मांग बढ़ती। इससे बाकी उद्योगों को भी मजबूती मिलती।

हर बाजार के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बने अनिवार्य 

किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं कि एपीएमसी एक्ट की सबसे बड़ी मजबूती यह थी कि यहां किसान को अपनी फसल का एक न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल जाता था, जबकि खुुले बाजार के होने से कौन व्यापारी कोई फसल कितने मूल्य में खरीदेगा, यह वह और किसान तय करेंगे। लेकिन आशंका है कि जब किसान को ज्यादा पैसे की जरूरत होती है, उस स्थिति में ये व्यापारी उसकी मजबूरी का लाभ उठाकर फसल को सस्ती कीमतों पर खरीदेंगे। इससे किसानों को नुकसान होगा।

केंद्र सरकार का कहना है कि एपीएमसी मंडियां खत्म नहीं की जाएंगी और किसान अपनी फसल यहां भी बेच सकेंगे। यानी किसान एमएसपी का लाभ एपीएमसी मंडियों में उठाते रह सकते हैं, लेकिन बाजार में मूूल्य ज्यादा होने पर वे अपनी फसल वहां बेच सकेंगे। इससे हर हाल में किसानों का फायदा होगा।

किसानों के लिए दोहरा बाजार उपलब्ध होने की बात पहली नजर में तो ठीक लगती है, लेकिन किसान नेताओं की चिंता है कि एपीएमसी मंडियों में फसल खरीदने के लिए व्यापारी को टैक्स देना पड़ता है। इससे बचने के लिए वह बाहर के बाजार से फसलों की खरीद करेगा। इससे धीरे-धीरे एपीएमसी मंडियां खत्म हो जाएंगी। इसके बाद व्यापारी खुले बाजार में अपनी मनचाही कीमतों पर फसल खरीदी करेगा।

इस समस्या का एक ही समाधान हो सकता है कि सरकार कानून में यह तय करे कि खुले बाजार में भी फसलों की खरीद एमएसपी से नीचे नहीं की जा सकेगी। इससे खुले बाजार में व्यापारी किसानों का आर्थिक शोषण नहीं कर सकेंगे।

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सड़कों पर उतरेंगे किसान

ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति के राष्ट्रीय संयोजक सरदार वीएम सिंह ने बताया कि यह बिल किसानों को आर्थिक गुलामी में जकड़ने वाला है। इसके लिए हरियाणा-पंजाब में किसान पूर्णबंदी करेंगे। आगामी 25 सितंबर को राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन किया जाएगा और प्रतिरोध दिवस मनाया जाएगा। इसमें 300 से ज्यादा किसान संगठन भाग लेंगे।

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