अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घूस कांड में भाजपा के निशाने पर भले ही कांग्रेस और उसके शीर्ष नेता हों, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय इस छानबीन में जुटा है कि
इस दागी कंपनी को काली सूची से हटाने और इसे रक्षा सौदों की प्रक्रिया में शामिल करने के पीछे कौन था।
सरकारी एजेंसियों के शक के दायरे में भारतीय विदेश सेवा के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैं, जो वाजपेयी सरकार और मनमोहन सरकार दोनों में बेहद प्रभावशाली रहे हैं और मौजूदा सरकार के एक शक्तिशाली मंत्री से भी उनके बेहद करीबी रिश्ते हैं। यह जानकारी देने वाले शीर्ष स्तरीय खुफिया सूत्रों ने बताया कि भारतीय विदेश सेवा के एक पूर्व अधिकारी जो कभी रक्षा मंत्रालय में भी तैनात रह चुके हैं, उनकी रक्षा उपकरण बनाने वाली कई बड़ी कंपनियों के साथ खासी निकटता है। उक्त अधिकारी संयुक्त राष्ट्र और लंदन में भी तैनात रह चुके हैं। लंदन जिसे हथियार सौदागरों का सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय केंद्र माना जाता है, यहां तैनाती के दौरान उक्त पूर्व राजनयिक ने हथियार कारोबारियों और उनके एजेंटों के साथ अपने रिश्ते बना लिए थे।
सेवानिवृत्ति के बाद उक्त राजनयिक देश में रक्षा सौदों की लॉबिंग में खासे सक्रिय हो गए। रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय में अपने संपर्कों का लाभ उठाकर उक्त पूर्व राजनयिक ने रक्षा उपकरण निर्माता कंपनियों का रास्ता आसान करने में अहम भूमिका निभाई। सूत्र बताते हैं कि जांच एजेंसियों को शक है कि उक्त पूर्व राजनयिक ने अगस्ता वेस्टलैंड की भी मदद करके उसे काली सूची से बाहर निकालने और मेक इन इंडिया कार्यक्रम में शामिल करवाने में सरकार में अपने संपर्कों का इस्तेमाल किया।