मधुमेह के लिए बीजीआर-34 के बाद अब सफेद दाग को लेकर ल्यूकोस्किन दवा के रूप में सरकार को बड़ी कामयाबी मिली है। रक्षा वैज्ञानिकों की इस खोज ने न सिर्फ चिकित्सा को नई दिशा दी है। बल्कि शोध करने वाले रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिक डॉ. हेमंत पांडे को विज्ञान पुरुस्कार से सम्मानित भी किया है।
अब तक 1 लाख मरीजों में सफल परिणाम मिलने के बाद अब सरकार ग्रामीण अंचलों तक इसे ले जाने की तैयारी में है। आयुर्वेद शोधों को लेकर ऐसा पहली बार है जब सरकार को सीएसआईआर के अध्ययन बीजीआर-34 और ल्यूकोस्किन के रुप में बड़ी कामयाबी मिली हो। वर्ष 1958 से भारतीय थल सेना एवं रक्षा विज्ञान संस्थान के तकनीकी विभाग के रूप में संचालित डीआरडीओ इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण के अलावा चिकित्सीय क्षेत्र में भी कई अध्ययन कर चुका है। यहां राडार, प्रक्षेपास्त्र के अलावा देशी जड़ी बूटियों से संबंधित कई बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं।
दरअसल शरीर पर उभरने वाले सफेद दाग के पीड़ित देश में करीब 4 से 5 फीसदी हैं। राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में तो 5 से 8 फीसदी लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं। भारत में इस त्वचा रोग को ले कर लोगों को समाज में बहुत परेशानी झेलनी होती है, क्योंकि अक्सर लोग इसे कुष्ठ रोग समझ लेते हैं जो जीवाणु संक्रमण है। इसके लिए जागरुकता लाने के लिए ही 25 जून को दुनिया भर में विश्व विटिलिगो दिवस मनाया जाएगा।
सरकार ने इसी दिवस पर अपनी ये उपलब्धि भी साझा की है। उत्तराखंड के पिथौड़ागढ़ स्थित डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ बायो एनर्जी रिसर्च (डिबियर) के हर्बल औषधि विभाग के प्रमुख डॉ. हेमंत पांडे ने बताया कि सफेद दाग को लेकर लोगों को बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हिमाचल की करीब एक दर्जन जड़ी बूटियों पर गहन अध्ययन के बाद ल्यूकोस्किन दवा का निर्माण हुआ।
ल्यूकोस्किन मलहम और मुंह से ली जाने वाली ओरल लिक्विड दोनों ही स्वरूप में उपलब्ध है। समय के साथ ल्यूकोस्किन की सफलता दर उम्मीद से कई गुना ज्यादा मिली। इसीलिए अब एक बार फिर से ल्यूकोस्किन के नए रुप में लाने के लिए भी वे प्रयास कर रहे हैं।
क्यों जरूरत पड़ी अध्ययन की
वर्ष 2015 में एग्री-इनोवेशन पुरस्कार विजेता डॉ. पांडे का कहना है कि इस समय विटिलिगो (सफेद दाग) के कई तरह के इलाज हैं, जिनमें एलोपैथिक दवाएं, ऑपरेशन और मूल उपचार के साथ दी जाने वाली अजंग्टिव थेरेपी शामिल है। लेकिन इस बीमारी के निदान में इनमें से किसी भी उपाय के संतोषजनक नतीजे नहीं आ रहे हैं। इसीलिए उन्होंने इसका फॉमूर्ला तलाशने पर काम शुरू कर दिया था।
आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. नीतिका कोहली ने बताया कि मलहम में सात जड़ी-बूटियों का उपयोग किया गया है। इनमें स्किन फोटो सेंसिटाइजर, फोड़े-फूंसी रोधक, जलन और खुजली रोधक, रोगाणु रोधक, जख्म भरने वाले और कॉपर सप्लिमेंटिंग तत्व शामिल है। इसी तरह ओरल दवा को इस तरह विकसित किया गया है कि नए चकते (स्पॉट) ना बनें।
रक्षा वैज्ञानिकों के साथ मिलकर करेंगे अध्ययन
बताया जा रहा है कि रक्षा वैज्ञानिकों के उन्नत अध्ययन सामने आने के बाद सरकार उनके साथ आयुष और स्वास्थ्य को जोड़ते हुए संयुक्त रुप से अध्ययन करा सकती है। ताकि देश के ग्रामीण क्षेत्रों तक इनका सीधा लाभ पहुंचाया जा सके। आयुष को जिला स्तर तक ले जाने में सरकार को कामयाबी मिल चुकी है। अब कहा जा रहा है कि साढ़े 12 हजार हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों के जरिए सरकार इसे किसानों तक पहुंचाने पर काम शुरू कर चुकी है। 2021 तक इसका लाभ भी मिलने लगेगा।