फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

एक और लड़ाई: कोरोना को मात दी, लेकिन नहीं मिल रहा इंश्योरेंस क्लेम, कर्ज लेकर चुकाया मेडिकल बिल

Sat, 05 Jun 2021 11:48 AM IST
Tanuja Yadav न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कोरोना को हरा चुके कई लोग अपनी वित्तीय स्थिति को लेकर परेशान हैं। निजी अस्पतालों में कोरोना के इलाज के बिल लाखों रुपये में आ रहे हैं। वहीं हर साल इंश्योरेंस कंपनी का प्रीमियम भरने के बाद भी लोगों को मेडिक्लेम नहीं मिल रहा है।
विज्ञापन
कोरोना सैंपल लेता स्वास्थ्यकर्मी - फोटो : पीटीआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

एक तरफ देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है तो दूसरी तरफ कोरोना से ठीक होने वाले मरीज और उनके परिवारजन कोरोना के इलाज में लगाए पैसों की भरपाई करने में जुटे हैं। कोरोना का इलाज इतना महंगा है कि इसके लिए लोग कर्ज तक ले रहे हैं, इतना ही नहीं कोरोना के खिलाफ मेडिकल इंश्योरेंस मिलना भी मुश्किल हो गया है। मेडिकल इंश्योरेंस कंपनियों में कई शिकायतें दर्ज की जा रही हैं। आइए जानते हैं कि देशभर में इंश्योरेंस कंपनियों की क्या हालत है और ये लोगों को कैसे इलाज में मदद कर रही हैं...

विज्ञापन


महाराष्ट्र: लोगों को लूट रहीं इंश्योरेंस कंपनियां
महाराष्ट्र के अकोला में रहने वाली पूजा तिवारी अक्तूबर 2020 में कोरोना पॉजिटिव निकली और बाद में होटल रेजेंसी कोविड केयर सेंटर अस्पताल में भर्ती हुईं। इसके बाद उनकी बेटी और पति में कोरोना के लक्षण दिखने लगे। पूजा तिवारी का मेडिकल बिल 2.84 लाख रुपये हुआ, जिसमें ब्लड रिपोर्ट्स, रेमडेसिविर और दूसरे मेडिकल चार्ज शामिल हैं। पूजा को उम्मीद थी कि उसकी इंश्योरेंस कंपनी उसकी मदद करेगी लेकिन कंपनी की तरफ से सिर्फ 11000 रुपये का कवरेज मिला। इसके बाद पूजा ने कंपनी पर कानूनी कार्रवाई के तहत नोटिस भेजा, जिसके बाद कंपनी ने अतिरिक्त 8000 रुपये चुकाए। 

उत्तर प्रदेश: कोरोना से जीते लेकिन वित्तीय स्थिरता डगमगाई
ग्रेटर नोएडा में रहने वाले संजीव सक्सेना की पत्नी कोरोना पॉजिटिव हुईं, जिसके बाद मई में उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और ऑक्सीजन सपोर्ट देना पड़ा। इसके लिए संजीव की पत्नी को 15 दिन के लिए आईसीयू में रखा गया। संजीव ने कहा कि जब मेरी पत्नी ऑक्सीजन सपोर्ट पर थी, तब मेडिक्लेम कंपनियों से लड़ने की हालत नहीं थी। संजीव की पत्नी ने कोरोना को हरा दिया लेकिन पत्नी पर लगे छह लाख रुपये ने संजीव की कमर तोड़ दी। ना ही इंश्योरेंस कंपनी ने संजीव को रिफंड दिया और ना ही अस्पताल के बिल भरे। संजीव के अलावा ऐसे कई लोग हैं, जिन्होंने कोरोना को मात दे दी लेकिन इंश्योरेंस कंपनियों की तरफ से ना मिलने वाली मदद ने उनकी वित्तीय स्थिरता को हिला दिया। 

विज्ञापन
विज्ञापन

राजस्थान: सरकारी इंश्योरेंस नहीं मान रहे अस्पताल

राजस्थान के बूंद जिले में रहने वाले हंसराज पंछल कोरोना पॉजिटिव निकले और ब्लैक फंगस की चपेट में आने के बाद उनकी मौत हो गई। पंछल का इलाज जयपुर के निजी अस्पताल में चल रहा था और उनके इलाज का खर्च सात लाख रुपये तक गया। पंछल के भाई का कहना है कि राज्य सरकार ने दावा किया है कि अगर आपके पास सरकारी मेडिक्लेम है तो आपका इलाज मुफ्त में होगा लेकिन कोई इसे मान नहीं रहा है। 

मध्यप्रदेश: मेडिक्लेम का भुगतान नहीं कर रहीं कंपनियां
राज्य के एक निवासी राहुल शर्मा 25 अप्रैल को कोरोना पॉजिटिव हुए लेकिन हालत बिगड़ने के बाद वो कोविड केयर सेंटर में भर्ती हो गए। राहुल ने एक मई को इंश्योरेंस कंपनी को अपनी हालत के बारे में जानकारी दी, जिसके बाद कंपनी ने राहुल से अस्पताल के बिल और डिस्चार्ज पेपर मांगे। राहुल का अस्पताल का खर्च 80000 रुपये का आया। लेकिन कंपनी ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया। राहुल ने बताया कि 80000 मेरे लिए कोई छोटी रकम नहीं थी क्योंकि मेरे पास कोई नौकरी नहीं है, इसलिए अस्पताल का बिल चुकाने के लिए मुझे गोल्ड लोन लेना पड़ा। 

इंश्योरेंस एजेंट का मत
स्टार हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी के एजेंट अमित कुमार पांडेय का कहना है कि कैशलेस सुविधा होने के बाद भी कई अस्पताल मरीजों का इलाज इससे नहीं कर रहे थे। इसलिए मरीज अपना इलाज पैसे देकर कर रहा है और इंश्योरेंस कंपनी से उम्मीद लगाए बैठा कि वो कवरेज देंगे। हालांकि जानकारों का कहना है कि एजेंट किसी का भी क्लेम निरस्त नहीं कर सकते। जानकारों का कहना है कि लोगों के पास पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए और आवश्यक डॉक्यूमेंट होने चाहिए। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें