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सरोगेसी के बाद आईवीएफ और स्पर्म बैंकों को नियंत्रित करेगी सरकार

Sat, 27 Aug 2016 01:09 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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सरोगेसी
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सरोगेसी बिल के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय की योजना आईवीएफ (विट्रो फर्टिलाइजेशन), भ्रूण ट्रांसफर और स्पर्म बैंकों को नियंत्रित करने की है। गौरतलब है कि बांझपन से जुड़ी सेवाएं और इंडस्ट्री पूरे देश में तेजी से पनप रही हैं। अनुमान के तौर पर भारत में आईवीएफ और सरोगेसी सेवाएं 3000 करोड़ की इंडस्ट्री का रूप ले चुकी हैं। 
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सरोगेसी बिल को ड्राफ्ट करने में अहम भूमिका निभाने वाली हेल्थ रिसर्च डिपार्टमेंट की सचिव सौम्या स्वामीनाथन ने कहा, 'हमें इस बात की पूरी जानकारी है कि इस तरह के क्लिनिक बढ़ रहे हैं और इन्हें रेगुलेट करने की जरूरत है।'
 

तय होंगे नियम कायदे

- फोटो : File Photo
क्लिनिकों को रेगुलेट करने के साथ ही आर्ट (ART) बिल (Assisted Reproductive Technology) में स्पर्म डोनेशन और भ्रूण ट्रांसफर को रेगुलेट करने के लिए प्रक्रिया के नियम कायदों को भी तय करना है। माना जा रहा है कि आर्ट बिल में मुआवजे और खर्च को लेकर भी गाइडलाइन तय की जाएगी। 

एक अधिकारी ने कहा, 'ड्राफ्ट किए गए आर्ट बिल को जल्द ही पब्लिक किया जाएगा। बिल थोड़ा पुराना है और उसमें कुछ बदलाव की जरूरत है। जरूरत है कि इसमें कुछ और चीजों को भी शामिल किया जाए। हम इस पर काम कर रहे हैं।'

स्वामीनाथन ने कहा कि सरोगेसी को नियंत्रित करना जरूरी हो गया था क्योंकि यह नियंत्रण से बाहर जा रहा था और सरकार पार्लियामेंट में कई बार आश्वासन दे चुकी थी।
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सरोगेसी बिल को मंजूरी

- फोटो : File Photo
गौरतलब है कि केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को सरोगेसी बिल को मंजूरी दे दी। कॉमर्शियल सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाते हुए सरकार ने 'परोपकारी सरोगेसी' को मंजूरी दी। इसके तहत भारतीय जोड़ों के करीबी रिश्तेदार ही सरोगेट मदर बन सकती हैं। 

आधुनिक जीवनशैली और विवाह में देरी की वजह से भारत में बांझपन की समस्या बढ़ती जा रही है। शादीशुदा जोड़ों की एक बड़ी संख्या आर्ट तकनीक का विकल्प चुन रही है। हालांकि आर्ट तकनीक के जरिए सफलता की दर सवालों के घेरे में है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत में आर्ट तकनीक की सफलता का प्रतिशत 20 से 30 प्रतिशत ही है। 

अध्ययन के मुताबिक भारत में 30 से 40 चालीस वर्ष की आयु के बीच बांझपन की समस्या आम होती जा रही है। 
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