दिल्ली में निर्भया की घटना से पहले पीड़ित महिलाएं खुलकर सामने नहीं आती थी। उनके साथ अत्याचार होता, मगर वे पुलिस तक पहुंचने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2012 में जब निर्भया कांड हुआ तो उस वर्ष 706 दुष्कर्म के मामले सामने आए थे। अगले साल इन मामलों की संख्या 1636 हो गई। 2014 में ये मामले 2166 तक पहुंच गए। निर्भया के बाद पीड़िताओं ने चुप्पी साधे नहीं रखी। इसी तरह महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और शीलभंग की शिकायतें भी एक ही साल में 727 से 3515 पर पहुंच गई।
निर्भया के बाद पीड़िताओं की खामोशी टूट गई। वे सीधे पुलिस आयुक्त के मोबाइल पर अपनी शिकायत देनी लगीं। युवतियों ने अपनी शिकायत देने के लिए दोस्तों के मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया, लेकिन वे चुप नहीं रही। दिल्ली पुलिस की महिला हेल्पलाइन के तत्कालीन नोडल अफसर सुधीर यादव (स्पेशल पुलिस आयुक्त) के फोन पर डेढ़ माह में 1850 शिकायतें मिली थी। पुलिस आयुक्त के अनुसार, 80 फीसदी मामलों में शिकायतकर्ता बोली, हम पुलिस कार्रवाई से संतुष्ट हैं।
निर्भया कांड से पहले छेड़छाड़, घरेलू हिंसा और अश्लील संदेश व अवांछित फोन कॉल जैसे मामलों में दिल्ली की महिलाएं चुप रहती थी। हालांकि कुछ महिलाएं पुलिस को बताती थी, लेकिन अधिकांश घर वालों के दबाव और लोकलाज के चलते चुप्पी नहीं तोड़ पा रही थी। साल 2012 के बाद भले ही युवतियां अपने दोस्त के नंबर से दिल्ली पुलिस के महिला हेल्पलाइन नंबर पर शिकायत दर्ज कराती, लेकिन उन्हें किसी भी सूरत में मनचलों की हरकतें बर्दास्त नहीं थी। दिल्ली पुलिस की महिला हेल्पलाइन के नोडल अफसर सुधीर यादव (स्पेशल सीपी) के फोन पर ऐसी शिकायतों का अंबार लगता चला गया।
2012 में 16 दिसंबर को वसंत विहार में निर्भया के साथ हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद महिलाओं की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करने के लिए स्पेशल महिला हेल्पलाइन शुरू की गई थी। इससे पहले महिलाओं के साथ घटित होने वाले सभी मामलों की जानकारी पुलिस तक नहीं पहुंच पाती थी। कई मामलों में महिलाओं ने पुलिस तक अपनी बात पहुंचाने के लिए आगे कदम बढ़ाया तो कार्रवाई में उन्हें निराशा हाथ लगी। वजह, मामले का एसएचओ या चौकी इंचार्ज तक सीमित रह जाना। निर्भया मामले के बाद चूंकि सभी शिकायतें स्पेशल सीपी के मोबाइल फोन पर सुनी जाने लगी, इसलिए महिलाएं भी अपनी बात कहने से नहीं हिचकती। इतना ही नहीं, कई महिलाएं तो अपनी शिकायत देने के लिए सीधे स्पेशल सीपी के सामने पहुंचने लगी।
शिकायत मिलते ही चार मिनट में कार्रवाई शुरू हो जाती थी...
पहले महिला की शिकायत दर्ज करने में न केवल आनाकानी होती थी, बल्कि पुलिस द्वारा दर्जनों सवाल दागे जाते थे। निर्भया के बाद शुरु हुए हेल्पलाइन नंबर पर केवल महिला की बात को सुना जाता था, उसके साथ कोई तर्क-वितर्क नहीं किया जाता। शिकायतकर्ता की बात सुनने के चार मिनट बाद कार्रवाई शुरू हो जाती। दो दिन बाद स्पेशल सीपी दफ्तर से फोन कर मामले का फालोअप लिया जाता। एसएमएस, ईमेल और व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित होकर शिकायत दर्ज कराने का प्रावधान किया गया।
2012 में निर्भया चली गई, मगर महिलाओं को बोलना सिखा गई...
साल दिल्ली में रेप के मामले छेड़छाड़ व शीलभंग
2012 706 727
2013 1636 3515
2014 2166 4322
2015 2199 5367
2016 2155 4165
2017 2146 3422
2018 2135 3314
2019 2000 से अधिक 3300 से अधिक
इस तरह के मामलों में खुलकर बोलने लगी महिलाएं ...
फोन पर अश्लील बातें, गालियां और धमकी देने के मामलों में महिलाएं खुलकर सामने आने लगीं। शिकायत देने के बाद उन्हें थोड़ी राहत भी मिली। नंबर बदल-बदल कर फोन करने वालों के खिलाफ भी जमकर कार्रवाई हुई। इसके लिए कई युवतियों ने अपने घर वालों का नंबर पुलिस को नहीं बताया, उन्होंने अपने किसी दोस्त या परिचित के मोबाइल फोन से पुलिस को शिकायत भेजी।यह इसलिए किया गया ताकि परिवार वालों की बदनामी न हो। विवाह संबंधी विवाद, घरेलू हिंसा और सार्वजनिक स्थलों पर छेड़छाड़ जैसे मामले खूब सामने आने लगे। 509 आईपीसी के मामले भी कई गुणा बढ़ गए। जैसे 2012 में इस धारा के तहत दर्ज मामलों की संख्या 214 थी।2013 में 916, 2014 में 1361 और 2015 में 1492 केस दर्ज किए गए।