ब्रिटेन का जनमत संग्रह बेशक यूरोपीय संघ से उसके अलग होने को लेकर है। मगर इसका राजनीतिक असर विश्व के साथ-साथ भारत पर भी पड़ेगा। ब्रिटेन की जनता ने यूरोपीय संघ पर देश की अस्मिता और सुरक्षा को तरजीह दिया है। यही वजह रही कि तमाम उद्योगपतियों और दिग्गज नेताओं के अनुरोध को दरकिनार कर ब्रिटिश जनता ने देश हित को सर्वोपरी माना है। चुकी ब्रिटेन की हर हलचल का असर विश्व के अन्य देशों पर पड़ता है। इसलिए अब यह तय माना जा रहा है कि राष्ट्रवाद (दक्षिणपंथ)की राजनीति को विश्व स्तर पर बल मिलेगा। जोकि वामपंथ के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
लोकसभा चुनाव में मोदी की जीत के बाद से भारत में पहले से ही राष्ट्रवादी राजनीति केंद्र में हावी है। तो ब्रिटेन का जनादेश इस्लामिक विस्तार की मानसिकता के लिए अशुभ संकेत हैं। सबसे बड़ी चोट उस विचार को लगी है जिसमें कुछ लोग सीमा रहित विश्व (बाउंड्री लेस वल्र्ड) की कल्पना कर रहे थे। ब्रिटेन के चुनावी नतीजों का असर अमेरिकन राष्ट्रपति पद के चुनाव पर पडना तय माना जा रहा है। वहां दक्षिणपंथ की राजनीति कर रहे डोनाल्ड ट्रंप की राह आसान हो सकती है।
ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह का परिणाम इस्लामिक विस्तार का मंसूबा देख रहे मुस्लिम देशों के लिए भी बड़ा झटका माना जा रहा है। अब से ठीक 10 माह पहले ब्रिटेन में हुए एक और जनमत संग्रह में स्कॉटलैंड की जनता ने ब्रिटेन के साथ बने रहने के पक्ष में मतदान किया था।
शुक्रवार को आए जनमत संग्रह के परिणाम में जनता ने ईयू से अलग रहने का निर्णय लिया है। माना जा रहा है कि सीरीया के घटनाक्रम के बाद ब्रिटेन के लोगों की सोच बदली है। मानवीय पहल करते हुए ईयू के देशों ने सीरीया से भागे मुस्लिमों को संरक्षण तो दे दी। लेकिन उसके बाद से वहां डेमोग्राफिक बदलाव की चिंता सताने लगी है। साथ ही कानून व्यवस्था की चुनौती भी बढ़ी है। ब्रिटेन की जनता को लगता है कि ईयू से अलग हटकर वे अपने देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ अस्तित्व भी बचा सकते हैं।