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त्वरित टिप्पणीः जयराम ठाकुर के सिर पर ताज ने बढ़ाई शांता कुमार के चेहरे की चमक

Mon, 25 Dec 2017 07:34 AM IST
शशिधर पाठक
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भाजपा पर्यवेक्षक दल ने मंडी के सिराज से लगातार पांच बार के विधायक जयराम ठाकुर के सिर पर ताज सजा सजा दिया है। छह जनवरी 2018 को अपना अगला जन्मदिन मनाने जा रहे जयराम ठाकुर को नये साल से पहले मिली इस शुभकामना ने हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और साफ-सुथरी छवि के नेता शांता कुमार के चेहरे की चमक बढ़ा दी है। 
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केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा का खेमा भी खुशी से झूम रहा है। इसी के साथ हिमाचल में भाजपा ने राजनीति के नये दरवाजे पर पांव भी रख दिया है।

शांता कुमार जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री पद पर देखना चाहते थे। मंडी के सिराज से विधायक चुने गए जयराम ठाकुर की जगत प्रकाश नड्डा से भी करीबी है। इसलिए जयराम के नाम पर मुहर लगने में कोई दिक्कत नहीं आई। 
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जयराम 1998 से विधायक हैं। वह 2007-2012 तक हिमाचल सरकार के ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज मंत्री रहे हैं। छात्र राजनीति के समय में वह आरएसएस से जुड़ गए थे और स्नातक की पढ़ाई के दौरान वह भारतीय जनता पार्टी की छात्र ईकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सक्रिय सदस्य थे।

जयराम की खासियत है कि वह मिलनसार, हंसमुख हैं। आम तौर पर लो प्रोफाइल रहते हैं। विरोधियों को शालीनता से कमजोर करने में माहिर हैं। यही वजह रही कि उनके विरोधी तो कई हुए लेकिन उन्हें कड़ी चुनौती देने लायक नहीं। नड्डा के करीबी सूत्र का कहना है कि जयराम ठाकुर एक अच्छा चेहरा हैं। वह क्षत्रिय समाज से आते हैं। हिमाचल में क्षत्रिय अच्छी खासी तादाद में हैं और जयराम को 13 वां मुख्यमंत्री चुने जाने में यह एक बड़ा फैक्टर था।

शांता कुमार की थे पसंद

दूसरी ओर, शांता कुमार ने खुल्लम खुल्ला तो ठाकुर का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने पर्यवेक्षकों को अपनी इच्छा बता दी थी। शिमला में पर्यवेक्षकों की पहले दौर की बैठक के बाद जब धूमल समर्थकों ने नारा लगाया और इसकी प्रतिक्रिया में जयराम समर्थकों ने भी नारेबाजी की तब भी शांता कुमार ने अपनी राय जाहिर कर दी थी। 

मीडिया के सामने आए तो बिना नाम लिए इतना भर बोले कि जनता ने मैंडेट दे दिया है। उसका सम्मान होना चाहिए। चुने गए विधायकों में से ही राज्य का मुख्यमंत्री चुना जाए तो बेहतर है। 

शांता कुमार की यह राय जहां धूमल को खारिज कर रही थी, वहीं हिमाचल में नई राजनीति का सूत्रपात कर रही थी। शांता कुमार की इस राय में जेपी नड्डा की राय भी शामिल थी। माना यह जा रहा है कि इस एकता के पीछे प्रेम कुमार धूमल को थोड़ा पीछे धकेलना था।

खूब चली धमा चौकड़ी
18 दिसंबर को विधानसभा चुनाव का नतीजा जहां प्रदेश अध्यक्ष सत्ती और प्रेम कुमार धूमल, सांसद अनुराग ठाकुर के लिए बुरी खबर लेकर आया, वहीं धूमल विरोधियों के चेहरे पर नई मुस्कान खिल गई। धूमल खेमा अनुराग ठाकुर की भविष्य की राजनीति को देखते हुए जेपी नड्डा के खिलाफ रहता है। 

नड्डा भी हथियार डालने वालों में नहीं हैं। शांता कुमार और धूमल के बीच में समीकरण कामचलाऊ हैं। टिकट बंटवारे के दौरान भी इसका असर दिख रहा था। शांता कुमार परिपक्व राजनीति करते हैं। नड्डा शांता कुमार का आदर करते हैं। 

वहीं धूमल के पास चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा उन्हें मुख्यमंत्री घोषित करने का बल था। धूमल ने भले ही पार्टी हाई कमान के निर्देश का पालन करते हुए शनिवार को प्रेस विज्ञप्ति जारी करके खुद को मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर बताया हो लेकिन उनकी उम्मीद आखिरी दौर तक बनी थी। 

इसकी बस दो वजहें थी। पहली यह कि वह वित्त मंत्री अरुण जेटली के करीबी हैं। प्रधानमंत्री मोदी से एक अलग रिश्ता है। अनुराग ठाकुर को भी जेटली का आशीर्वाद प्राप्त है। दूसरा उनके समर्थक विधायक वीरेन्द्र कुमार समेत अन्य धूमल के लिए सीट छोडऩे को तैयार थे। 
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हिमाचल की राजनीति का नया अध्याय

jairam thakur
यही कारण रहा कि जब जयराम ठाकुर धूमल से मिलने गए तो उन्होंने (धूमल ने ) न केवल सधा हुआ व्यवहार किया, बल्कि अगले पल उनके समर्थकों ने धूमल की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी भी बनाए रखी। इसके बरअक्स दोनों तरफ से खूब प्रयास हुए। एक तरफ सभी धूमल विरोधी एक छत के नीचे आ गए और दूसरी तरफ धूमल ने विरोध की हवा देखकर आखिरी समय में हथियार डाल दिया। नड्डा को भी दिल्ली से लेकर शिमला तक यह बदलाव मंजूर था।

जयराम ठाकुर के मुख्यमंत्री बनने के बाद हिमाचल प्रदेश भाजपा की राजनीति में नया पन्ना जुड़ गया है। जयराम ठाकुर के समर्थक अब अपनी जगह बनाएंगे। वरिष्ठ शांता कुमार की अहमियत बनी रहेगी। 

जगत प्रकाश नड्डा  के लिए दिल्ली से शिमला का रूट उम्मीद भरा बना रहने की संभावना है। वहीं विधानसभा चुनाव हार चुके प्रो. प्रेम कुमार धूमल की स्थिति केन्द्रीय हाई कमान से मिल रही आक्सीजन पर चलेगी। अनुराग ठाकुर की मेहनत थोड़ा बढ़ जाएगी। 2019 में लोकसभा चुनाव भी होने हैं और माना जा रहा है कि तबतक हिमाचल प्रदेश की राजनीति में नये समीकरण तेजी से अपनी जगह बना लेंगे।
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