अफस्पा का विरोध करते लोग (फाइल फोटो)
क्या अफस्पा को निरस्त करने के प्रयास पहले भी हुए हैं?
नवंबर 2000 में एक बस स्टैंड के पास दस लोगों को सैन्य बलों ने गोली मार दी थी। इस घटना के वक्त मणिपुर की इरोम शर्मिला वहीं मौजूद थीं। उन्होंने 2000 में, अफस्पा के खिलाफ भूख-हड़ताल शुरू की, जो 16 साल तक जारी रही और यह कानून अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों रहा। सुरक्षाबलों पर नागरिकों का उत्पीड़न और महिलाओं के साथ दुष्कर्म करने के आरोप लगे। 10-11 जुलाई 2004 की दरमियानी रात 32 वर्षीय थंगजाम मनोरमा का कथित तौर पर सेना के जवानों ने दुष्कर्म कर उसकी हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद 15 जुलाई 2004 को करीब 30 मणिपुरी महिलाओं ने नग्न होकर प्रदर्शन किया था।
इसी साल यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश के तहत पांच सदस्यीय समिति का गठन किया। न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी आयोग ने 2005 में अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए कहा कि अफस्पा उत्पीड़न का प्रतीक बन गया है और इसे निरस्त करने की सिफारिश की गई। वीरपा मोइली की अध्यक्षता वाले दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी इन सिफारिशों का समर्थन किया।
रक्षा मंत्रालय के विरोध के बाद फैसले पर लगी रोक
पूर्व गृह सचिव जी के पिल्लई ने भी अफस्पा को निरस्त करने का समर्थन किया था। पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने एक बार कहा था कि यदि अधिनियम को निरस्त नहीं किया जाता है, तो कम से कम संशोधन किया जाना चाहिए, लेकिन रक्षा मंत्रालय के विरोध के बाद सभी संभावित फैसले पर रोक लग गई। बाद में यूपीए सरकार ने एक कैबिनेट उप-समिति का गठन किया। एनडीए सरकार ने बाद में उप-समिति भंग कर दी और रेड्डी आयोग के निष्कर्षों को भी खारिज कर दिया।