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ADR Reports: राजनीतिक दल से लेकर प्रदेश तक..., वंशवाद की राजनीति में कौन आगे? चौंकाने वाले आंकड़े आए सामने

Fri, 12 Sep 2025 08:54 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ऐडीआर और एनईडब्ल्यू की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 21 प्रतिशत मौजूदा सांसद, विधायक और विधान पार्षद राजनीतिक परिवारों से हैं। लोकसभा में यह आंकड़ा सबसे अधिक 31 प्रतिशत है। कांग्रेस में 32, भाजपा में 18 और सीपीआई (एम) में केवल आठ प्रतिशत वंशवादी नेता हैं। इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि कैसे कई कड़े नियम लाकर परिवारवाद की राजनीति पर लगाम लगाई जा सकती है।
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भारतीय राजनीति में वंशवाद कितना प्रभावी। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
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भारतीय राजनीति में वंशवाद की राजनीति को लेकर लगातार सभी दल एक दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं। हालांकि, कोई भी दल खुद की गिरेबान में झांक कर नहीं देखता कि उसके दल में कितने ऐसे नेता है, जो सिर्फ और सिर्फ परिवारवाद राजनीति की ही उपज हैं। इसी बीच एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्ल्यू) ने वंशवाद की राजनीत को लेकर एक रिुपोर्ट जारी की है। इसमें विस्तार से बताया है कि भारत की राजनीति में वंशवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं? 
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इस रिपोर्ट ने भारतीय राजनीति में वंशवाद की हकीकत सामने रख दी है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि संसद और विधानसभा के मौजूदा प्रतिनिधियों में से हर पांच में से एक नेता राजनीतिक परिवार से आता है। सबसे चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि सिर्फ लोकसभा में यह आंकड़ा 31 प्रतिशत तक पहुंच गया है। आइए अब विस्तार से जानते हैं भारत की राजनीति में वंशवादी राजनीति कितने पांव पसार चुकी है। किस राज्य और किस दल में कितने नेता ऐसे हैं, जो अभी भी सिर्फ और सिर्फ परिवारवाद के कारण ही जनप्रतिनिधि की कुर्सियों पर बैठे हैं। साथ ही ये भी समझेंगे कि परिवारवाद की राजनीति पर कैसे लगाम लगाई जा सकती है।

कितने प्रतिनिधि वंशवाद राजनीति की उपज?
रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल 5,204 मौजूदा सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों में से 1,107 यानि 21 प्रतिशत नेता वंशवादी पृष्ठभूमि रखते हैं। राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस सबसे आगे है, जहां 32 प्रतिशत नेताओं का राजनीतिक परिवार से ताल्लुक है। भाजपा में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत है, जबकि वाम दल सीपीआई(एम) में सिर्फ आठ प्रतिशत प्रतिनिधि ऐसे हैं। लोकसभा में वंशवाद सबसे गहरा है, जहां 31 प्रतिशत सांसद राजनीतिक परिवारों से आते हैं। राज्यसभा में यह 21 प्रतिशत और विधान परिषदों में 22 प्रतिशत है। राज्य विधानसभाओं में यह संख्या अपेक्षाकृत कम है, लेकिन वहां भी यह 20 प्रतिशत तक पहुंचती है।
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इन राज्यों में सबसे ज्यादा परिवारवाद
रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई बड़े राज्यों में राजनीति पूरी तरह परिवार आधारित होती जा रही है। सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश में है, जबकि अनुपात के लिहाज से आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र वंशवाद के गढ़ बने हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 604 मौजूदा सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्यों का विश्लेषण किया गया, जिनमें से 141 यानि 23% नेता वंशवादी पृष्ठभूमि से हैं। इसीलिए संख्या के लिहाज से यूपी सबसे आगे है।

महाराष्ट्र इस मामले में दूसरे नंबर पर है, जहां 129 यानि 32 प्रतिशत नेताओं का ताल्लुक राजनीतिक परिवार से है। बिहार में भी वंशवाद गहराई तक पहुंचा हुआ है, यहां 96 यानि 27 प्रतिशत नेताओं की पृष्ठभूमि राजनीतिक है। वहीं, अगर दक्षिण भारत की राजनीत में नजर डाले तो कर्नाटक में 94 यानि 29 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 86 यानि 34 प्रतिशत नेता वंशवादी परिवारों से ही आते हैं। अनुपात के हिसाब से आंध्र प्रदेश सबसे ऊपर है, जहां हर तीन में से एक नेता राजनीतिक परिवार से है।

असम में सिर्फ नौ प्रतिशत यानि 13 नेता ही वंशवाद की उपज हैं। यह आंकड़े साफ बताते हैं कि भारतीय राजनीति में वंशवाद क्षेत्रीय रूप से भले अलग-अलग दिखे, लेकिन बड़े और प्रभावशाली राज्यों में यह लोकतंत्र की सबसे गहरी जड़ बन चुका है। राज्य स्तरीय दलों में एनसीपी (शरदचंद्र पवार गुट) और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस 42 प्रतिशत के साथ सबसे ऊपर हैं। वाईएसआर कांग्रेस में 38 और टीडीपी में 36 प्रतिशत नेताओं का राजनीतिक परिवार से ताल्लुक है। वहीं तृणमूल कांग्रेस (10 प्रतिशत) और एआईएडीएमके (चार प्रतिशत) में वंशवाद बेहद कम दिखता है।

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छोटे दल और निर्दलीय भी वंशवाद से अछूते नहीं
एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट ये भी बताया गया है कि वंशवाद सिर्फ बड़े दलों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे दलों और निर्दलीयों में भी इसकी गहरी पैठ है। कई छोटी पार्टियां तो पूरी तरह परिवार आधारित निकली हैं। रिपोर्ट में कई छोटे अपंजीकृत दलों के 87 मौजूदा सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों का विश्लेषण किया गया। इनमें से 21 यानि 24% नेताओं का ताल्लुक राजनीतिक परिवारों से है। हैरानी की बात यह है कि नौ ऐसी पार्टियां हैं जहां सभी सदस्य 100% वंशवादी पृष्ठभूमि से आते हैं। ये दल अक्सर परिवार-आधारित या छोटे-निचले स्तर के संगठन होते हैं।

निर्दलीय नेताओं के बीच भी वंशवाद का असर साफ दिखता है। 94 निर्दलीय प्रतिनिधियों में से 23  यानि 24% वंशवादी हैं। रिपोर्ट बताती है कि कई निर्दलीय नेता औपचारिक दलों से बाहर रहते हुए भी अपने पारिवारिक राजनीतिक नेटवर्क का इस्तेमाल कर राजनीति में बने रहते हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि वंशवाद भारतीय राजनीति की जड़ें सिर्फ राष्ट्रीय दलों में ही नहीं, बल्कि छोटे संगठनों और स्वतंत्र उम्मीदवारों में भी मजबूती से फैली हुई हैं।

महिला नेताओं में वंशवाद सबसे ज्यादा
रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू यह है कि महिला नेताओं में वंशवाद की हिस्सेदारी पुरुषों से कहीं ज्यादा है। कुल महिला सांसदों और विधायकों में से 47 प्रतिशत राजनीतिक परिवार से हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में 60 से 70 प्रतिशत महिला नेता वंशवादी पृष्ठभूमि से आती हैं।

वंशवाद क्यों हावी है?
रिपोर्ट बताती है कि वंशवाद केवल सीटों की विरासत नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति का ढांचा बन चुका है। उम्मीदवारों के चयन में ‘विन्नेबिलिटी’, चुनावों का महंगा होना और दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी इसकी बड़ी वजहें हैं। पार्टियां अक्सर उन्हीं नेताओं को प्राथमिकता देती हैं जिनके पास पहले से पैसे, ताकत और संगठनात्मक नेटवर्क मौजूद हैं।
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वंशवाद पर कैसे लगेगी लगाम?
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट ने वंशवाद के गहरे असर को उजागर करने के साथ ही इसके समाधान भी सुझाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जब तक राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक परिवारवाद की जड़ें मजबूत बनी रहेंगी।
  • दलों पर सख्त कानून की जरूरत...रिपोर्ट का कहना है कि राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली पर एक व्यापक कानून बनाया जाना चाहिए। इसमें आंतरिक चुनाव, गुप्त मतदान से पदों का चयन, उम्मीदवारों के टिकट वितरण की प्रक्रिया और महिलाओं को कम से कम एक-तिहाई टिकट देने का प्रावधान होना चाहिए। साथ ही, नियम तोड़ने पर सख्त सिविल और आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान भी जरूरी बताया गया है।
  • महिलाओं की भागीदारी पर जोर...रिपोर्ट ने साफ किया कि महिलाओं को केवल टोकन उम्मीदवार बनाने की प्रवृत्ति खत्म होनी चाहिए। दलों को महिलाओं को उनकी  योग्यता और विश्वसनीयता के आधार पर टिकट देना चाहिए, न कि परिवारिक पृष्ठभूमि या पैसों के दम पर। इससे महिलाएं वास्तविक नीति-निर्माण में भाग ले सकेंगी और प्रॉक्सी राजनीति से बचाव होगा।
  • खर्च पर नियंत्रण जरूरी...एडीआर ने ये भी सुझाव दिया कि चुनाव आयोग सभी दलों से उम्मीदवार चयन के मानदंड सार्वजनिक करने को कहे। साथ ही, दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की मांग भी रखी गई है। चुनाव खर्च पर सीमा तय करने का प्रस्ताव किया गया है ताकि पैसा और परिवारिक नेटवर्क राजनीति में हावी न हो सकें।
  • नई पीढ़ी को मौका...रिपोर्ट ने राजनीतिक विविधता पर जोर दिया है। इसमें युवाओं और खासकर गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं को प्रोत्साहित करने की बात कही गई है। साथ ही, जन-जागरूकता अभियान के जरिए मतदाताओं को भी समझाना जरूरी बताया गया है कि वंशवाद से लोकतंत्र और जवाबदेही कमजोर होती है।


 
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