प्रशासन ने 15 फरवरी 2015 को ही शासन में रिपोर्ट भेजकर कह दिया था कि कब्जाधारियों के पास असलहे हैं। यह लोग कभी भी माहौल को बिगाड़ सकते हैं। स्थिति गंभीर हो सकती है। मगर पुलिस और प्रशासन की इस संयुक्त रिपोर्ट पर शासन ने कोई संज्ञान नहीं लिया।
जवाहर बाग खाली कराने के प्रयास लंबे समय से चेल रहे हैं। खुफिया विभाग भी इस मुद्दे पर शासन को रिपोर्ट देता रहा है। खुद जिलाधिकारी राजेश कुमार और तत्कालीन एसएसपी मंजिल सैनी ने 2015 में शासन को रिपोर्ट भेजकर ताजा हालातों से वाकिफ कराते हुए दिशा निर्देश मांगे थे। मगर शासन से कोई जवाब ही नहीं आया।
लिहाजा प्रशासन भी चाहकर कुछ नहीं कर पा रहा था। पत्र भेजकर कहा गया था कि स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह और स्वाधीन भारत सुभाष सेना के बैनर तले एक यात्रा रामवृक्ष यादव के नेतृत्व में राजकीय जवाहर बाग में प्लास्टिक की पन्नियों से झोंपड़ी तैयार कर रही है। ये लोग बाबा जयगुरुदेव की मृत्यु का प्रमाण पत्र, स्वाधीन भारत की करेंसी को लागू करने और एक रुपये में 60 लीटर डीजल देने की मांग करते हैं।
जिला अधिकारी ने प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर कहा था कि इन लोगों की संख्या 5 से 6 हजार तक है। इनके पास अवैध असलहे भी हैं जिनका ये प्रयोग कर सकते हैं।
शासन पर भारी रहा कोर्ट का दबाव
जवाहर बाग प्रकरण में बार के पूर्व अध्यक्ष विजयपाल सिंह तोमर ने कब्जाधारियों द्वारा स्थानीय लोगों को परेशान किए जाने के बाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। इस याचिका की सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने 20 मई 2015 को शासन के प्रमुख सचिव, डीएम और एसएसपी को जवाहर बाग खाली कराने के आदेश दिए।
गौर करने वाली बात ये है कि एक तरफ जिलाधिकारी का शासन को लिखा कड़ा पत्र और दूसरी ओर न्यायालय का आदेश, इसके बावजूद लखनऊ में बैठे आला अफसर जवाहर बाग प्रकरण पर खामोश रहे। याचिकाकर्ता विजयपाल सिंह तोमर सत्ताधारी दल के कद्दावर नेता पर गंभीर सवाल उठाते हुए बेबाकी से कहते हैं कि इन कब्जाधारियों को संरक्षण दिया जा रहा था।
यहां तक कि जनवरी 2016 में अवमानना याचिका पर प्रमुख सचिव, डीएम और एसएसपी को नोटिस जारी किए गए।