देश में एसिड अटैक पीड़ितों को मुआवजा नहीं मिल रहा है। सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र से सामने आए हैं। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों को राज्य के विधिक सेवा प्राधिकरण से संपर्क करने के लिए कहा है।
मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने मुंबई स्थित एनजीओ एसिड सर्वाइवर्स साहस फाउंडेशन के वकील की दलीलों के बाद यह निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र में एसिड अटैक पीड़ितों को मुआवजा मिलने में देरी हो रही है। ऐसे पीड़ित राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों (एसएलएसए) से संपर्क करें।
पीठ ने कहा कि मुआवजा भुगतान में देरी के मामले में पीड़ितों को राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी जाती है। कोर्ट ने विधिक सेवा प्राधिकरण को एक चार्ट बनाने का भी निर्देश दिया गया। इसमें पीड़ितों या उनके परिवार के सदस्यों द्वारा मुआवजा मांगने का समय और इसे प्राप्त करने का दिन शामिल किया जाए।
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पीठ ने कहा कि एसिड अटैक पीड़ितों को मुआवजा देने में देरी को उसके संज्ञान में लाया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि याचिका पर केंद्र और 11 राज्यों ने अपने जवाब दाखिल नहीं किए हैं। अदालत ने उन्हें चार सप्ताह का समय दिया और सुनवाई 5 मई के सप्ताह में तय की।
2014 में जारी आदेश को लेकर दायर की गई याचिका
एनजीओ ने 2023 में 2014 में प्रसिद्ध लक्ष्मी बनाम भारत संघ के आदेश को लेकर जनहित याचिका दायर की है। आदेश में कहा गया है कि एसिड अटैक पीड़त को सार्वजनिक और निजी दोनों अस्पतालों में मुफ्त इलाज मिलना चाहिए। संबंधित राज्य सरकार द्वारा देखभाल और पुनर्वास लागत के रूप में न्यूनतम तीन लाख रुपये का मुआवजा दिया जाना चाहिए।
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याचिका में एसिड की बिक्री को विनियमित करने, अपराधियों को दंडित करने और चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पुनर्वास प्रदान करने के अदालत के प्रयासों के बावजूद एसिड अटैक पीड़ितों के संघर्ष को उठाया गया है। याचिका में मुआवजे की राशि बढ़ाने के निर्देश मांगे गए हैं। साथ ही एसिड अटैक पीड़ितों की सुनवाई फास्ट-ट्रैक कोर्ट द्वारा करने जाने की मांग की गई।
याचिका में कहा गया है कि कई पीड़ित हमलों के कई साल बाद भी मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं, जिससे वे आर्थिक रूप से कमजोर हो गए हैं। इसमें कहा गया है कि निजी अस्पताल अदालत के निर्देशों के बावजूद आपातकालीन देखभाल प्रदान करने से पहले अग्रिम भुगतान की मांग करते रहे और पुनर्निर्माण सर्जरी की उच्च लागत कई पीड़ितों के लिए बाधा बन रही है।
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