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Court: तलाकशुदा पत्नी की हत्या मामले में पति समेत तीन आरोपी हाईकोर्ट से बरी, निचली अदालत ने सुनाई थी सजा-ए-मौत

Fri, 18 Jul 2025 02:22 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता

सार

कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2014 की जयंती देब हत्या मामले में मौत की सजा पाए सुरोजित देब, लिपिका पोद्दार और संजय बिस्वास को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। सियालदह रेलवे स्टेशन से शव के टुकड़े मिलने के बाद तीनों को गिरफ्तार किया गया था।
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कलकत्ता हाईकोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक बड़ी टिप्पणी करते हुए 2014 में अपनी पत्नी की हत्या के आरोप में मौत की सजा पाए एक व्यक्ति और दो अन्य को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति देबांग्शु बसाक और न्यायमूर्ति मोहम्मद शब्बर राशिदी की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। कोर्ट ने तीनों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।
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यह मामला सुरोजित देब, उसकी दोस्त लिपिका पोद्दार और संजय बिस्वास के खिलाफ था। इन पर आरोप था कि सुरोजित ने अपनी पत्नी जयंती देब की हत्या की, लिपिका ने मदद की और संजय ने शव के टुकड़े ठिकाने लगाने में सहयोग किया। लेकिन कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो सके कि हत्या तीनों ने ही की थी।

शव के टुकड़े स्टेशन से बरामद हुए थे
20 मई 2014 को कोलकाता के सियालदह रेलवे स्टेशन की पार्किंग में एक बिस्तर में शव के कटे हुए टुकड़े मिले थे। बाद में डीएनए परीक्षण और अन्य साक्ष्यों के आधार पर पुष्टि हुई कि यह शव जयंती देब का था। उस समय पुलिस ने सुरोजित और उसकी महिला मित्र लिपिका पर हत्या का शक जताया था और उन्हें गिरफ्तार किया गया था।
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दोष सिद्ध न होने पर तीनों को किया गया बरी
कोर्ट में बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियुक्त उस जगह पर मौजूद ही नहीं थे, जहां से शव के टुकड़े मिले थे। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष यह भी साबित नहीं कर पाया कि शव पार्किंग में किसने छोड़ा था। ऐसे में यह तय करना मुश्किल है कि हत्या आरोपियों ने ही की है। कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि को पूरी तरह खारिज कर दिया।

सेशन कोर्ट ने 2019 में सुनाई थी मौत की सजा
इससे पहले 20 जुलाई 2019 को सियालदह सेशन कोर्ट ने तीनों को हत्या का दोषी ठहराया था और दो दिन बाद मौत की सजा सुनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इसे न केवल गलत ठहराया बल्कि साक्ष्यों के अभाव में तीनों को बरी कर दिया। कोर्ट ने साफ किया कि अभियोजन की तरफ से पेश सबूत आरोपियों के खिलाफ दोष साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
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राज्य सरकार का पक्ष नहीं माना कोर्ट ने
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि सेशन कोर्ट का फैसला सही था और उसे बरकरार रखा जाना चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट की पीठ ने यह मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि अपीलकर्ताओं के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत मौजूद नहीं है और उन्हें दोषी ठहराना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

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