स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया (एसडब्लूआई) की रिपोर्ट में सामने आया है कि देश में अधिकांश कामगारों का वेतन दस हजार रुपये प्रतिमाह से भी कम है। इसमें 82 प्रतिशत पुरुष और 92 फीसदी महिला कामगार शामिल हैं। पिछले डेढ़ दशक में अगर मेहनताने की बात करें तो उसमें सालाना तीन फीसदी या उससे ज्यादा की वृद्धि हुई है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा मंगलवार को एसडब्लूआई रिपोर्ट जारी की गई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी क्षेत्रों में मेहनताना सातवें केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा अनुशंसित वेतन (18,000 रुपए प्रति माह) से काफी कम है। मेहनताने की तुलना में श्रमिक उत्पादकता कई गुना तेजी से बढ़ी है। परिणामस्वरूप नियोक्ताओं को श्रमिकों की तुलना में कहीं ज्यादा फायदा हुआ है। रोजगार कम पैदा हुए हैं। भारत आर्थिक विकास की उच्च दर को अच्छी नौकरियों में बदलने के लिए जूझ रहा है, खासकर अपने शिक्षित युवाओं के लिए। हालांकि, जाति और लैंगिक असमानताएं अभी तक कम नहीं हो सकी हैं।
युवाओं और उच्च शिक्षितों के बीच बढ़ी बेरोजगारी की दर
विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर अनुराग बेहार ने कहा कि भारत के लिए अपने सभी नागरिकों हेतु न्यायसंगत और टिकाऊ आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है। गहन शोध पर आधारित यह रिपोर्ट ऐसे कई मुद्दों की पड़ताल करती है जो देश में रोजगार वृद्धि को निष्पक्ष और पूर्ण समावेशन के साथ एक अभियान का रूप दे सकते हैं। विश्वविद्यालय के सदस्य एवं रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने कहा कि यह रिपोर्ट पिछले कई दशकों की उन संरचनात्मक समस्याओं का विश्लेषण करती है जिन्होंने पर्याप्त रोजगार पैदा होने में बाधा उत्पन्न की है। युवाओं और उच्च शिक्षितों के बीच बेरोजगारी की दर 16 फीसदी तक पहुंच गई है।
रिपोर्ट के अनुसार पिछले दशक में संगठित औद्योगिक क्षेत्र का प्रदर्शन अच्छा रहा है। कई उद्योगों (विशेष तौर पर बड़े नियोक्ता जैसे बुने हुए कपड़े, प्लास्टिक और फुटवियर) में मेहनताने और रोजगारों में वृद्धि हुई है। इसकी एक वजह यह है कि 1980 और 1990 के दशकों के मुकाबले मजदूरों के स्थान पर मशीनों के इस्तेमाल की प्रवृत्ति धीमी हुई है।
कामगारों के बीच बहुत हैं लैंगिक व जातिगत असमानताएं
रिपोर्ट बताती है कि कामगारों के बीच लैंगिक व जातिगत असमानताएं बहुत अधिक हैं। उदाहरण के लिए सभी सेवा क्षेत्र के कामगारों में 16 प्रतिशत महिलाएं हैं जबकि घरेलू कामगारों में 60 फीसदी महिलाएं हैं। इसी तरह, सभी कामगारों में 18.5 प्रतिशत अनुसूचित जातियों से हैं जबकि चमड़े के कुल कामगारों में से 46 फीसदी अनुसूचित जातियों से हैं। हालांकि समय के साथ आय में लैंगिक अंतर घट रहा है। भुगतान पाने वाले कार्यों में महिलाओं की भागीदारी विभिन्न राज्यों में अलग-अलग है। उदाहरण के लिए जहां उत्तर प्रदेश में प्रति 100 पुरुषों पर केवल 20 महिलाएं भुगतान पाने वाले कार्यों में हैं वहीं तमिलनाडु में यह संख्या 50 और उत्तर-पूर्वी राज्यों में 70 है।
रिपोर्ट में राष्ट्रीय रोजगार नीति बनाने का सुझाव
- दुनिया भर में रोजगार गारंटी के विचार की लोकप्रियता बढ़ रही है। मनरेगा के साथ भारत इस ट्रेंड का अगुवा रहा है और इसके अनुभव के आधार पर इसे आगे बढ़ाना चाहिए।
- वैश्विक स्तर पर औद्योगिक नीति में रुचि बढ़ी है और मेहनताना सब्सिडी व कुशल कामगारों का कौशल बढ़ाने वाली नई नीतियों का उदय हुआ है।
- सफल राज्य-स्तरीय रोजगार नीतियों का विश्लेषण करने और राज्य के अनुभवों की विविधता से सीखने की जरूरत है।
- सार्वजनिक निवेश के लिए इस्तेमाल की जाने वाली राजकोषीय गुजांइश पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। कृषि में आय के स्तर को बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है और इसके लिए सार्वजनिक निवेश जरूरी है।
- यूनिवर्सल बेसिक सर्विसेस (यूबीएस) प्रोग्राम बनाने पर विचार करना चाहिए। नौकरियों, मानव पूंजी और सार्वजनिक सेवाएं बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सार्वजनिक परिवहन एवं सुरक्षा में निवेश करना उचित होगा।