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राजधानी में रोज गुम हो रहे हैं 18 बच्चे, ढूंढने में नाकाम दिल्ली पुलिस अब लेगी मोबाइल एप का सहारा

Tue, 25 Sep 2018 09:52 PM IST
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
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दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक देश की राजधानी दिल्ली में रोजाना 18 बच्चे गुम होते हैं। बच्चों के सबसे ज्यादा गुम होने के मामले दिल्ली के नरेला, समयपुर बादली व शाहबाद डेयरी इलाकों में दर्ज किए गए। आंकड़ों के अनुसार 2017 में कुल 6,450 बच्चे गुम हुए, जिनमें लगभग चार हजार बच्चियां और 2500 लड़के थे। पुलिस उन गुमशुदा बच्चों को ढूंढने में नाकाम साबित हुई है। अब दिल्ली पुलिस इस काम के लिए मोबाइल एप का सहारा लेने जा रही है। 
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संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) और अलायंस फॉर पीपुल्स राइट के सहयोग से मंगलवार को दिल्ली में गुमशुदा बच्चों पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में बच्चों के अपहरण और बहला-फुसला कर ले जाने के मामले सबसे ज्यादा दर्ज किए गए। एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिपोर्ट्स ब्यूरो) की रिपोर्ट के मुताबिक 52,252 दर्ज मामलों में 48.9 फीसदी मामले केवल बाल अपहरण के थे। रिपोर्ट बताती है कि 2016 में 22, 340 नाबालिग लड़के लापता हुए, वहीं नाबालिग लड़कियों की संख्या लगभग 41 हजार थी।

बाल तस्करी के लिए कुख्यात पश्चिमी बंगाल से कहीं पीछे है दिल्ली

रिपोर्ट में कुछ चौंकाने वाले आंकड़े भी सामने आए हैं। दिल्ली पुलिस को भेजी आरटीआई के जवाब में पता चला कि गुम हुए 6,450 बच्चों में आठ साल तक की उम्र के 263 लड़के लापता हुए, जबकि बच्चियों की संख्या 213 थी। वहीं 08-12 साल की उम्र वाले बच्चों में 507 लड़के और 166 लड़कियों के लापता होने के मामले दर्ज हुए। जबकि 12-18 साल की आयु वाले लापता बच्चों में 3536 लड़कियां और 1665 लड़के थे।

रिपोर्ट का कहना है कि दिल्ली पुलिस बच्चों के लापता होने बाद उन्हें ढूंढ पाने में भी नाकाम साबित हुई है। 2012 से लेकर साल 2017 तक दिल्ली में 26,761 बच्चों के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज हुई, लेकिन पुलिस केवल 9,727 बच्चों का ही पता लगा सकी, जो कुल मामलों का मात्र 36.34 फीसदी रहा। इस मामले में दिल्ली पुलिस चाइल्ड ट्रैफिकिंग के लिए मशहूर पश्चिम बंगाल, गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से भी पीछे रह गई। क्षेत्रफल में दिल्ली से कई गुना बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का चाइल्ड रिकवरी औसत क्रमशः 54.79 प्रतिशत और 76.59 प्रतिशत रहा। जबकि बाल तस्करी के लिए कुख्यात पश्चिमी बंगाल में लगभग 85 प्रतिशत बच्चों को पुलिस ने ढूंढ कर उनके घर पहुंचाया।

10 दिन में लांच हो जाएगा एप, यह होगी खासियत

दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के डीसीपी डॉ. जॉय टिर्की का कहना है कि दिल्ली में बच्चों के लापता होने के बढ़ते मामलों के पीछे मुख्य कारण लोगों का जागरूक न होना है। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस को एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट के अलावा सामाजिक संगठनों और एनजीओ के साथ मिल कर काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि वे अगले 10 दिनों में मोबाइल फोन बेस्ड फेशियल रिकाग्निशन तकनीक पर आधारित मोबाइल एप लांच करने जा रहे हैं।

इसमें दिल्ली का कोई भी नागरिक संदिग्ध लापता बच्चों की फोटो क्लिक करके एप पर अपलोड कर सकता है, जो सीधे गुमशुदा बच्चों के डाटाबेस से कनेक्ट हो जाएगी। इसके बाद संबंधित व्यक्ति के मोबाइल पर थाने का नंबर और एफआईआर नंबर भी आ जाएगा, जिससे संपर्क करके वह उस बच्चे के बारे में सूचित कर सकता है।

जॉय ने बताया कि यह मोबाइल एप किसी भी बच्चे के चेहरे की बनावट का ब्यौरा स्टोर करता है और 'ट्रैक चाइल्ड' पोर्टल पर उपलब्ध तस्वीर व डाटा के साथ मिलान करता है। इससे बच्चे की पहचान तत्काल स्थापित हो जाती है। उन्होंने बताया कि दिल्ली के हर कांस्टेबल के मोबाइल पर यह एप इंस्टाल होगा।
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बाल तस्करी रोकने के लिए सामाजिक जागरूकता बहुत जरूरी

दिल्ली स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के सदस्य सचिव संजीव जैन ने बताया कि हमारे पास कानूनी मदद के साथ जरूरी संसाधन भी उपलब्ध हैं। लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि इन सेवाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाई जाए। उन्होंने बताया कि हमारे पास पैरालीगल वॉलंटियर्स हैं, जो इन सेवाओं को समाज और लोगों तक पहुंचा सकते हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि दिल्ली बहुसंस्कृति वाला प्रदेश है, लेकिन यहां पर बच्चों से बात करने के लिए दुभाषिए और अनुवादक नहीं हैं।        

क्राई की क्षेत्रीय निदेशक सोहा मोइत्रा का कहना है कि खोए बच्चों के मुद्दे पर दिल्ली पुलिस का रोल बेहद अहम है। ऐसे मामलों के हल के लिए सामुदायिक स्तर पर एकीकृत बाल सरंक्षण योजना चलाए जाने की जरूरत है। इसके लिए समाज और व्यवस्था को साथ आना होगा। मोइत्रा ने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए पुलिस पेट्रोलिंग, सार्वजनिक जगहों पर बच्चों के गायब होने की घोषणा, लापता बच्चों के होर्डिंग और बैनर, सीसीटीवी कैमरे लगाने के साथ कई दूसरी रणनीतियां अपनाने की जरूरत है।
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