Arvind Kejriwal-Ashutosh
जातिगत राजनीति के लगते रहे हैं आरोप
वैसे यह तो साफ है कि आतिशी ने अपना सरनेम मार्लेन एक दिन में तो नहीं हटाया है पार्टी में इस पर अच्छे से सलाह मशविरा हुआ होगा और फिर मुख्यमंत्री और पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल साहब की रजामंदी के बाद तय किया गया होगा कि चुनाव जीतने के लिए जो भी जरूरी है, वो किया जाना चाहिए। नई राजनीति का उनका वादा पूरा करने से पहले ही पुराना हो चुका है। संगी साथियों के जाने से चौतरफा किरकिरी झेल रहे केजरीवाल डरे हुए हैं कि कहीं बीजेपी और दूसरी पार्टियां कहीं आतिशी के सरनेम को लेकर राजनीति न करें और उन्हें ईसाई न बताएं अगर ऐसा हुआ तो वह फिर वे चुनाव हार सकती हैं।
लेकिन मार्लेन के सरनेम हटाने और आशुतोष के दुख से यह तो तय हो गया है कि आप ने कुछ भी नया नहीं किया है बल्कि राजनीति का नाम ही दावे करना रहा है और वही केजरीवाल ने भी किया है। इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि अरविंद केजरीवाल न केवल खुद बल्कि उनके साथ कई और नेताओं ने राजनीति की वैतरणी पार करने में कामयाब रहे हैं। और उनका यह दावा कि वह साफ सुथरी राजनीति करने आए हैं वह कोरी कहावत साबित हो रही है।
लेकिन इन सबके बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति जाति से तो चलती है लेकिन अगर बंदे में हो दम तो राजनीति ईसाई की भी चलती है। और इसके लिए सबसे बड़ा उदाहरण हैं जॉर्ज फर्नांडिस। जब वह चुनावी मैदान में उतरे तो मतदाताओं ने उन्हें ईसाई को नहीं जॉर्ज के काम पर वोट दिया था।
जब केजरीवाल ने कहा था कि वो बनिया हैं
अरविंद केजरीवाल ने अन्ना आंदोलन से अलग होकर देश में आदर्शवादी राजनीति करने की बड़ी-बड़ी बातें कही थीं, लेकिन वक्त बे वक्त वो अपने समाज और जाति का जिक्र करना नहीं भूले। विधानसभा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के नेहरू प्लेस में कारोबारियों की एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था, 'मैं बनिया हूं और धंधा समझता हूं। उन्होंने कारोबारियों को लुभाने के लिए कई कदम उठाने का भी एलान किया।' केजरीवाल ने कहा था कि अग्रवाल समुदाय इस देश की इकॉनमी की रीढ़ की हड्डी है।
पार्टी है सवर्णों की
आम आदमी पार्टी की सर्वोच्च निर्णायक इकाई में भी आम आदमी की राजनीति करने का दावा करने वालों ने सभी 11 सदस्य सवर्ण हैं. दूसरी ओर पार्टी के 25 नेशनल कन्वेनर्स में से भी एक-दो नाम छोड़कर सभी सवर्ण हैं। पार्टी के दिल्ली में केजरीवाल सहित 7 मंत्री हैं जिनमें से 5 सवर्ण हैं। जाहिर है अरविंद केजरीवाल के लिए जातिवादी राजनीति को लेकर अपने ऊपर उठ रहे सवालों का जवाब देना आसान नहीं होगा।