ऐन चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। दिल्ली में आशुतोष के पार्टी छोड़ने से केजरीवाल पहले ही परेशान हैं, वहीं पंजाब में नेता प्रतिपक्ष से हटाए जाने के बाद से नाराज चल रहे सुखपाल सिंह खैरा गुट ने मंगलवार को पार्टी की नई पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी (पीएसी) का गठन कर उनकी मुश्किल और बढ़ा दी। पीएसी ने खैरा को पंजाब राज्य की इकाई का कार्यवाहक चीफ नियुक्त कर दिया। हालांकि अभी खैरा समर्थकों ने खुद को आम आदमी पार्टी से अलग घोषित नहीं किया है, लेकिन माना जा रहा है कि पंजाब में पार्टी की टूट तय है।
दरअसल, 19 अगस्त को अरविंद केजरीवाल पंजाब गए थे। वह वहां एक विधायक के पितृशोक होने के अवसर पर शामिल होने पहुंचे थे। वहां उनका सामना सुखपाल सिंह खैरा से हुआ था। लेकिन एक ही जगह होने के बावजूद दोनों नेताओं में कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई। दोनों ही नेताओं ने शोकाकुल परिवार के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर अपनी राह पकड़ ली।
हालांकि, आम आदमी पार्टी के एक नेता से मिली जानकारी के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल ने पार्टी के साथ बने हुए विधायकों से अपने स्तर पर सुखपाल सिंह खैरा को मनाने की बात कही। खैरा के साथ गए पार्टी विधायकों को समझाकर उन्हें वापस लाने का निर्देश भी दिया। लेकिन पार्टी विधायक किसी भी नाराज विधायक को मनाने में असफल रहे और आज खैरा गुट ने अपनी पीएसी का एलान कर दिया।
खैरा गुट को इस बात से भी मजबूती मिली है कि पहले चीफ व्हिप नियुक्त किये गए विधायक नाजर सिंह मानशाहिया ने खुद को चीफ व्हिप पद से हटाए जाने को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा है कि उन्हें पार्टी के सभी विधायकों की उपस्थिति में इस पद पर नियुक्त किया गया था। ऐसे में अरविंद केजरीवाल दिल्ली से रिमोट कंट्रोल के जरिये उन्हें नहीं हटा सकते।
मंगलवार को खैरा समर्थकों में से एक विधायक कंवर संधू ने प्रेस कांफ्रेंस के जरिए पार्टी की नई पीएसी के गठन की घोषणा की। उन्होंने खैरा को कार्यवाहक एक्टिंग चीफ बनाए जाने की भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अब पंजाब में आम आदमी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए जो भी निर्णय लिए जाएंगे वह सुखपाल सिंह खैरा के द्वारा ही लिए जाएंगे। इस तरह खैरा गुट ने हरपाल सिंह चीमा को सदन में नेता प्रतिपक्ष के पद पर स्वीकार करने से इनकार करने का भी संकेत दे दिया है।
हालांकि, इसी मौके पर खैरा ने कहा कि वे किसी भी कीमत पर आम आदमी पार्टी से अलग नहीं हो रहे हैं, और वे पार्टी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन वे इतना अवश्य चाहते हैं कि यहां का कोई फैसला यहां के लोगों की बात सुनकर किया जाए। उन्होंने कहा कि स्वराज में लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखकर ही उनका नेता चुने जाने की बात कही जाती रही है। ऐसे में आज पार्टी को दिल्ली के इशारे पर क्यों चलाया जा रहा है।