अक्सर विवादों में घिरे रहने वाले भारत सरकार द्वारा भारतीय नागरिकों के लिए जारी किया गया पहचान पत्र यानि आधार कार्ड, आज मदद के लिए चर्चा में है। 2017 से अब तक आधार की मदद से करीब 16 मानसिक रूप से विकलांग बच्चे अपने घर वापस लौट सके।
करीब 6 महीने पहले दमोह जिला, मध्य प्रदेश के रहने वाले 17 वर्षीय अरुण तिवारी जो बौद्धिक रूप से असक्षम हैं, अपने परिवार से ट्रेन में बिछड़ गए थे लेकिन आधार की मदद से अरुण अपने परिवार से फिर से मिल सका।
11 अप्रैल 2018 को, अरुण को यशवंतपुर स्टेशन से एक एनजीओ ने बचाया और उसके बाद होसुर रोड स्थित मानसिक रूप से विकलांग बच्चो के लिए बने सरकारी आश्रय गृह में भेज दिया गया। अधिकारियों द्वारा की गयी कोशिशों की वजह से अरुण अपने पिता, भारत प्रसाद तिवारी जो की एक व्यवसायी हैं से 2 जुलाई को दोबारा मिल सका।
अरुण जैसे ही कई बच्चो को रेलवे स्टेशनों और अन्य स्थानों से कई एनजीओ ने बचाया और उन्हें महिला एवं बाल कल्याण विभाग द्वारा संचालित सरकारी आश्रय गृह में भेज दिया गया। विभाग बाकि बच्चो को भी आधार के लिए नामांकित कर रहा है जिसकी मदद से अरुण जैसे बच्चों के परिवार का पता चल सका।
सरकारी आश्रय गृह के सुपरिटेंडेंट आर. नागराथ्ना ने बताया,''अगर पंजीकरण के दौरान डुप्लीकेट या नकली लिखा हुआ आता है इसका मतलब व्यक्ति पहले से आधार के लिए पंजीकृत है। इसके बाद हम आधार अधिकारियों की मदद से बच्चों के परिवार की जानकारी हासिल करते हैं''।
''यह केंद्र 12 से 21 वर्ष के बच्चों के लिए है साथ ही यह 72 बच्चे हैं। हम उन बच्चों का बहुत अच्छे से ध्यान रखते हैं लेकिन बच्चे तो परिवार को याद करेंगे ही। हम उन बच्चों को उनके परिवार से मिलाने की पूरी कोशिश करते हैं'', कर्मचारी ने बताया।
अरुण की तरह ही 17 साल का एक बच्चा दक्षिण बेंगलूरू में हरोहल्ली के पास मिला था। जिसे 3 अगस्त 2017 को सरकारी घर भेज दिया गया था। आधार पंजीकरण के दौरान मालूम हुआ की वह पहले से पंजीकृत है और ओडिशा सम्बलपुर जिले का रहना वाला है। ओडिशा पुलिस के साथ बच्चे के पिता भी बेंगलूर आये और जांच के बाद बच्चा फिर से अपने परिवार से मिल सका।