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मुंबई: अमित शाह बोले- पीएम मोदी की सुरक्षा नीति इतनी मजबूत है, दुश्मनों के पसीने छूट जाते हैं

Sun, 13 Sep 2026 04:03 PM IST
राहुल कुमार पीटीआई/आईएएनएस, नई दिल्ली।

सार

मुंबई में एक कार्यक्रम में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 2014 में ‘फ्रैजाइल फाइव’ में शामिल भारत आज शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में विभिन्न क्षेत्रों में हुए बदलावों और 7.8% विकास दर का उल्लेख किया। शाह ने सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर को मजबूत रक्षा नीति का उदाहरण बताया।
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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गृह मंत्री अमित शाह मुंबई दौरे के दौरान एशियाटिक सोसायटी में आयोजित गणेश ज्ञानार्थी प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, 2014 में भारत को 'फ्रैजाइल फाइव' (कमजोर अर्थव्यवस्था वाले पांच देशों) में गिना जाता था, लेकिन आज यह शीर्ष पांच देशों में शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सभी क्षेत्रों में बदलाव की शुरुआत की है। प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों में यह भरोसा जगाया है कि 15 अगस्त 2047 तक भारत सभी क्षेत्रों में दुनिया के सभी देशों से आगे होगा।

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देश को 'फ्रैजाइल फाइव' से निकाला: शाह
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कहते हैं, पिछले 12 वर्षों में सरकार ने देश में बड़े बदलाव किए हैं। 2014 में हमारा देश 'फ्रैजाइल फाइव' (कमजोर अर्थव्यवस्थाओं) में गिना जाता था, लेकिन आज यह टॉप पांच देशों में शामिल है। हाल के पहले तिमाही के आंकड़ों से पता चलता है कि विकास दर 7.8 प्रतिशत है, जिससे हम दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर सबसे आगे हैं। यह बदलाव सिर्फ कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा है; हमारे नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर सेक्टर में बदलाव किया है। कौन सोच सकता था कि देश को ऐसा प्रधानमंत्री मिलेगा जो आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान की सीमा में घुसकर जवाबी कार्रवाई करेगा? चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो, एयर स्ट्राइक हो या ऑपरेशन सिंदूर, हमारे नेता नरेंद्र मोदी ने इतनी मजबूत 'रक्षा नीति' बनाई है कि भारत पर हमले के ख्याल से ही दुश्मन के पसीने छूट जाते हैं।

भारत का रत्न और आभूषण व्यापार 6,000 साल पुराना: गृह मंत्री
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि दुनिया के साथ भारत का रत्न और आभूषण व्यापार 6,000 साल पुराना है।अमित शाह कहते हैं, समय बदल रहा है और व्यापार का तरीका भी बदल रहा है। अब लैब में बने हीरों का दौर आ गया है, और मैं आपसे गुजारिश करता हूं कि आप सिर्फ कीमत पर ध्यान न दें। वॉल्यूम के हिसाब से लैब में बने हीरों का बाजार मौजूदा डायमंड मार्केट से लगभग 50 गुना बड़ा होने वाला है, पूरे 50 गुना! यह एक बहुत बड़ा मौका है। जब दुनिया भर में ज्वेलरी का व्यापार आधुनिक हो रहा था, तब हम औपनिवेशिक शासन के अधीन थे। कई देश, यहाँ तक कि छोटे देश भी, हमसे आगे निकल गए। लेकिन अब, जब लैब में बने हीरों का दौर शुरू हो रहा है, तो हमारे पास इंफ्रास्ट्रक्चर, क्षमताएं, पूंजी और सबसे जरूरी बात,आप जैसे उद्यमी मौजूद हैं। मैं आप सभी से गुजारिश करता हूँ कि यह पक्का करें कि लैब में बने हीरों का पूरा इकोसिस्टम और मैन्युफैक्चरिंग चेन मजबूती से भारतीयों के हाथों में रहे, चाहे वह मैन्युफैक्चरिंग मशीनरी हो, खुद हीरे बनाना हो, ज्वेलरी बनाना हो, ब्रांड बनाना हो या दुनिया भर के शहरों में भारतीय कंपनियों के लिए शोरूम खोलना हो।
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नालंदा जला सकते हैं, स्मृति में बसा ज्ञान नहीं: अमित शाह
"मैं पहला गृह मंत्री हूं जो एशियाटिक सोसायटी में आया है, लेकिन मैं यहां गृह मंत्री के नाते नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा को सहस्रों वर्षों तक आगे ले जाने के आंदोलन के एक आंदोलनकारी के रूप में आया हूं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि एशियाटिक सोसायटी मुंबई भारतीय ज्ञान परंपरा की वाहक बनकर इसे देशभर में पहुंचाने का कार्य करेगी।"

उन्होंने कहा, "जो राष्ट्र अपनी भाषा, संस्कृति, स्मृति, इतिहास, संस्कार, अभिलेख और पंरपराओं की रक्षा नहीं कर सकता है, वह कितना भी शक्तिशाली हो, उसको समाप्त होने में देर नहीं लगती है। जो राष्ट्र अपनी भाषा, संस्कृति, स्मृति, इतिहास, संस्कार, भाषा, परंपराएं और व्यकारण की रक्षा करता है, वह चाहे जितने साल भी गुलाम रहे, उसको गुलाम नहीं बना सकता है, इसका भारत उदाहरण है। अनेक लोगों ने पूरे विश्व का मार्दर्शन देने वाले यहां पैदा हुए ओजस्वी ज्ञान को समाप्त करने का प्रयास किया, लेकिन नहीं कर पाए। नालंदा का पुस्तकालय जला सकते हैं, लेकिन स्मृति और श्रुति से जो लोगों के चित में बसा है, उस ज्ञान को कोई समाप्त नहीं कर सकता। गृह मंत्री ने कहा, "हमारे देश का संस्कार है कि जब हम पराजित होते हैं, तब धैर्य रखकर आगे बढ़ते हैं। जब विजयी होते हैं, तो जिन पर विजय प्राप्त करते हैं, उनकी स्मृतियों को नष्ट किए बिना हमारे परंपरा में जोड़ने का प्रयास करते हैं।"

अमित शाह ने एशियाटिक सोसायटी में परिवर्तन लाने पर जोर देते हुए कहा, "सच्चा ज्ञान, कभी किसी विचारधारा का बंधक नहीं होता। ज्ञान अपने आप में एक विचारधारा है और इसको किसी प्रकार से बांधते हो तो ज्ञान के मायने बदल जाते हैं। ज्ञान मुक्त और उन्मुक्त होना चाहिए। इसलिए एशियाटिक सोसायटी में जो ज्ञान, संपदा और एकत्रिकरण का उपयोग महान भारत की रचना में करना चाहिए। एशियाटिक सोसायटी के ज्ञान का इस्तेमाल अब विश्व के कल्याण के लिए होगा। अंग्रेजों ने ज्ञान और सत्ता को एक सूत्र में बांध दिया था, लेकिन अब ज्ञान और सत्ता को अलग कर ज्ञान के आधार पर सत्ता की रचना हो और देश चले, ऐसी व्यवस्था बनाने का काम एशियाटिक सोसायटी को करना चाहिए।"

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, "आज मैं यहां बहुत कम समय के लिए बोलने आया हूं, लेकिन मैं 'इंडोलॉजी' शब्द के बारे में जरूर बात करना चाहता हूं। एशियाटिक सोसायटी को समझने के लिए 'इंडोलॉजी' शब्द को समझना भी जरूरी है। न्यूमिजमैटिक्स (सिक्का-विज्ञान), एपिग्राफी (अभिलेख-शास्त्र), एंथ्रोपोलॉजी (मानव-विज्ञान), इतिहास, पुरातत्व, भाषा-विज्ञान, दर्शनशास्त्र, साहित्य, धर्मशास्त्र और व्याकरण - इन सबको मिलाकर 'इंडोलॉजी' बनी। हालांकि, मैं आज यह साफ करना चाहता हूं कि उस समय इसका मकसद दुनिया या ब्रह्मांड का कल्याण करना नहीं था, जो भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्ञान का मकसद होता है। इसका मकसद यहां की व्यवस्थाओं को समझना और लंबे समय तक लोगों पर राज करना था।"

गृह मंत्री ने कहा, "भारत का संस्कार है कि जब हम पराजित होते हैं, तो धैर्य रखकर आगे बढ़ते हैं और जब विजय प्राप्त करते हैं, तो जिन पर विजय पाई है, उनकी स्मृति को नष्ट किए बिना उन्हें अपनी परंपरा से जोड़ने का प्रयास करते हैं। एशियाटिक सोसायटी में बदलाव की बात करते हुए मैं कहना चाहता हूं कि सच्चे ज्ञान को कभी बांधा नहीं जा सकता। एशियाटिक सोसायटी के ज्ञान का भारत के विकास में किस तरह योगदान हो सकता है, इस पर काम करना चाहिए।"

अमित शाह ने कहा, "एशियाटिक सोसायटी के ज्ञान के संपूर्ण का विस्तार तीन दृष्टियों से होना चाहिए। ज्ञान का विस्तार करने वाले विद्वानों को यहां लाना चाहिए, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से देशभर के पुस्तकालयों को आपस में जोड़ना चाहिए और महाराष्ट्र के गांव-गांव में मौजूद पांडुलिपियों को सहेजकर उनके शोध व ज्ञान को भारतम पांडुलिपि के माध्यम से सामने लाने में योगदान देना चाहिए।"

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