सुप्रीम कोर्ट ने सेव लाइफ फाउंडेशन की जनहित याचिका पर मार्च 2016 में नोटिफ़िकेशन जारी कर 'गुड सेमेरिटन लॉ' को एक कानून की शक्ल दे दी थी। इसमें कहा गया था कि सड़क हादसे में अगर कोई व्यक्ति किसी घायल की मदद करता है तो कोई भी एजेंसी उसे पूछताछ या गवाही के नाम पर परेशान नहीं करेगी। अब दो साल बाद हालत यह है कि देश में 84 फीसदी लोगों को इस कानून के बारे में पता ही नहीं है।
नतीजा, सड़क हादसों में घायल होने वाले लोगों को फौरी तौर पर मदद नहीं मिल पाती, जिससे वे दम तोड़ जाते हैं।फाउंडेशन के सर्वे में 96 प्रतिशत चिकित्सा पेशेवरों ने स्वीकार किया है कि उनके अस्पतालों में 'गुड सेमेरिटन लॉ' कमेटी ही नहीं है।इसके अलावा 64 प्रतिशत पुलिस अफसरों ने माना है कि वे गुड सेमेरिटन के निजी विवरण लेते हैं। चार में से तीन लोग सड़क हादसे में घायल लोगों की मदद इसलिए नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे खुद किसी मुसीबत में फंस जाएंगे।
सेव लाइफ फाउंडेशन के संस्थापक पीयूष तिवारी ने सोमवार को कॉन्स्टिटूशन क्लब में यह सर्वे रिपोर्ट पेश करते हुए कहा, देश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरी तरह उल्लंघन हो रहा है। किसी भी अस्पताल ने अपने प्रवेश पर 'गुड सेमेरिटन लॉ चार्टर' का बोर्ड नहीं लगाया है। अनुसंधान एजेंसी एमडीआरए के सहयोग से किए गए इस सर्वे में 11 शहरों को शामिल किया गया है। इनमें दिल्ली, जयपुर, कानपुर, वाराणसी, लुधियाना, बंगलूरू, हैदराबाद, चेन्नई, मुंबई, इंदौर और कोलकाता शामिल हैं।
2018 से लेकर अब तक 3667 लोगों से की गई बातचीत पर आधारित इस सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है कि गुड सेमेरिटन कानून लागू होने के बाद भी नागरिकों को सड़क पर किसी घायल व्यक्ति की मदद करने के उनके नए अधिकारों की जानकारी ही नहीं है। नतीजन, लोग आज भी सहायता करने से हिचकते हैं। पुलिस और डॉक्टर, घायलों की मदद करने वालों से उनकी जानकारी मांगते हैं। कई मामलों में तो उन्हें जबरन गवाह बना देते हैं। कई जगह पर देखा गया है कि मददगार को ही अपराधी ठहरा दिया जाता है।