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Social Challenge : देश में 73 फीसदी बच्चे सोशल मीडिया पर सक्रिय, 10 में से तीन अवसादग्रस्त

Sat, 30 Jul 2022 06:23 AM IST
योगेश साहू परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

Social Challenge : दिल्ली एम्स में हर शनिवार संचालित क्लीनिक में साइबर बुलिंग के मामले आ रहे हैं। इनमें अधिकांश कॉलेज छात्राएं हैं। ऑनलाइन स्टडी एंड इंटरनेट एडिक्शन अध्ययन के अनुसार, 50% से ज्यादा साइबर बुलिंग के मामले दर्ज नहीं होते क्यूंकि लड़कियां अपनी परेशानी साझा नहीं कर पाती हैं और धीरे-धीरे अवसाद से ग्रस्त होने लगती हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
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विस्तार
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Social Challenge : कुछ दिन पहले यूपी के देवरिया में पबजी गेम के शौकीन लड़के ने अपने दादा को फंसाने के लिए छह वर्षीय मासूम की हत्या कर दी। मध्य प्रदेश में पोते ने दादा के लाखों रुपये गायब कर दिए। वहीं, लखनऊ में 16 वर्षीय लड़के ने अपनी मां की हत्या कर दी। विशेषज्ञ इन घटनाओं में ऑनलाइन गेम, सोशल मीडिया व इंटरनेट के घंटों इस्तेमाल से बच्चे व किशोरों में हिंसक व्यवहार होना मुख्य कारण मानते हैं।

  • अध्ययन बताते हैं, सोशल मीडिया पर सक्रिय 10 में से तीन बच्चे अवसाद, भय, चिंता के साथ चिड़चिड़ेपन के शिकार हैं। किसी का पढ़ाई में मन नहीं लगता है, तो कुछ बगैर फोन खाना तक नहीं खा पाते।   
  • बंगलूरू स्थित राष्ट्रीय मानसिक जांच एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निम्हांस) के अनुसार, देश के 73% बच्चे मोबाइल यूजर्स हैं। इनमें 30% मनोविकार से पीड़ित हैं।
  • नई दिल्ली एम्स के मनोचिकित्सक डॉ. यतन पाल सिंह बताते हैं, उनके यहां महीने में 15 से 16 बच्चे काउंसलिंग के लिए आते हैं जिनमें से 90% तक माॅडरेट व क्रोनिक स्थिति वाले हैं। यानी लक्षण तीसरी या फिर चौथी स्टेज जैसे दिखाई दे रहे हैं।

ऑनलाइन एडिक्शन : लक्षण

  • अगर कोई स्क्रीन के सामने लंबा वक्त बिता रहा है तो यह एक बड़ा लक्षण है।
  • परफॉर्मेंस घटना, चिड़चिड़ापन, नींद न आना, धैर्य खोना, गुस्सा आना।

एम्स क्लीनिक में साइबर बुलिंग के मामले भी आ रहे, पीड़ितों में लड़कियां सबसे अधिक, 10 में से एक किशोर साइबर बुलिंग का शिकार

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चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के अध्ययन के अनुसार, दिल्ली जैसे महानगरों में 10 में से एक किशोर साइबर बुलिंग का शिकार है।

साइबर स्टॉकिंग के मामले बढ़े
2017- 
542
2018- 739

सजा की दर घटी
2017-
40%
2018- 25%
निम्हांस के अनुसार, हर सप्ताह देशभर में मनोचिकित्सकों के पास सोशल मीडिया की लत से परेशान औसतन 10 मामले पहुंचते हैं, जिनमें 12 साल से भी कम उम्र के हैं।

साइबर बुलिंग : टारगेट पर ज्यादातर लड़कियां
दिल्ली एम्स में हर शनिवार संचालित क्लीनिक में साइबर बुलिंग के मामले आ रहे हैं। इनमें अधिकांश कॉलेज छात्राएं हैं। ऑनलाइन स्टडी एंड इंटरनेट एडिक्शन अध्ययन के अनुसार, 50% से ज्यादा साइबर बुलिंग के मामले दर्ज नहीं होते क्यूंकि लड़कियां अपनी परेशानी साझा नहीं कर पाती हैं और धीरे-धीरे अवसाद से ग्रस्त होने लगती हैं।
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यहां से शुरू होती है बच्चों की चिंता

  • सोशल प्लेटफॉर्म पर खुद को टैग नहीं किए जाने, वॉट्सग्रुप ग्रुप से रिमूव होने, पोस्ट पर लाइक्स या शेयर नहीं बढ़ने से चितिंत हो रहे हैं।
  • बार-बार फोन चैक करना। सोशल मीडिया पर दूसरों की पोस्ट देखना और इसी दुनिया पर भरोसा कर लेना।

खुद से पूछिए ये सवाल...

  • क्या ऑनलाइन वीडियो, साइट्स पर घंटों बिता रहे हैं?
  • आपका पढ़ाई या किसी काम में मन नहीं लग रहा?
  • जल्दी संयम खो देते हैं। बात-बात पर गुस्सा आता है?
  • अगर इनका जवाब हां है तो सचेत हो जाएं।

देश का पहला क्लीनिक निम्हांस में
इंटरनेट के लतखोर बच्चों-किशोरों की काउंसलिंग के लिए निम्हांस में देश का पहला क्लीनिक शुरू हुआ।

देश में स्मार्टफोन औसतन 10 साल की उम्र में बच्चे को मिलता है। इनमें से 12 वर्ष की उम्र तक 50% बच्चे सोशल मीडिया का उपयोग करने लग जाते हैं। - डॉ. दिनकरन, निम्हांस

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