जनप्रतिनिधत्व कानून में घालमेल का ताजा उदाहरण महाराष्ट्र है। राज्य में जिन दो दलों ने चुनाव पूर्व गठबंधन कर बहुमत हासिल किया वे साथ सरकार बनाने केलिए तैयार नहीं हैं। इसके उलट अलग-अलग लड़े तीन दलों की बेमेल गठबंधन सरकार की कोशिशें भी परवान नहीं चढ़ पाई। इसी बीच राज्यपाल ने अचानक एक बिल्कुल नए गठबंधन की सरकार को शपथ दिला दी। हालत यह है कि अब तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि जिसे शपथ दिलाई गई, जिसने सरकार बनाई उसे विधानसभा में बहुमत हासिल है भी या नहीं। दूसरी ओर यह भी अभी रहस्य ही है कि जो तीन दल सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं, उनके सभी विधायक उनके साथ हैं भी या नहीं।
इस स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन कहती हैं संविधान दिवस पर देश में लोकतंत्र और जनप्रतिनिधयों की स्थिति देश के भविष्य के लिए एक सिहरन पैदा कर रही है। समस्या यह है कि हमें संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार तो पता हैं, मगर हम इसी के साथ मौलिक कर्तव्य को भूल गए हैं। हम यह भूल जाते हैं कि संविधान में हमें अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य निभाने की भी बात साथ-साथ कही है। वर्तमान में बेहतर लोकतंत्र के लिए जरूरी मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य के बीच का मजबूत संतुलन खत्म होता जा रहा है।
राजनीति की बात करें तो वर्तमान में महाराष्ट्र का ही सियासी ड्रामा देखें। जनता ने वोट देकर मौलिक कर्तव्य तो निभा दिया है, मगर क्या सियासी दल नैतिक तरीके से सरकार गठन कर सेवा करने का कर्तव्य निभा रहे हैं? क्या महाराष्ट्र भारतीय राजनीति में इकलौता उदाहरण है? नहीं, बीते तीन से चार दशकों में जनप्रतिनिधियों, राजनीतिक दलों में सत्ता हासिल करने की ललक इतनी ज्यादा बढ़ी है कि इसमें नैतिकता अब बीती बात हो कर रह गई है। हमें यह याद रखना होगा कि जिस तरह सिर्फ बहती हुई नहीं ही जिंदा रहती है, उसी तरह लोकतंत्र अधिकार और कर्तव्य के बीच बेहतर संतुलन से ही जिंदा रह सकता है।