फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्या आपको याद है दूरदर्शन का ऐतिहासिक प्रतीक चिह्न और उससे जुड़ी यादें

Sat, 15 Sep 2018 12:20 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
1 of 11
भारतीय लोक सेवा प्रसारण 'दूरदर्शन' को आज पूरे 59 साल हो गए हैं। साल 1959 को 15 सितंबर के ही दिन इसे लॉन्च किया गया था। जो कि आधुनिक भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। अगर दूरदर्शन के लोगो को देखें तो यह एक आंख की तरह लगता है। जिससे हम दुनिया जहान के सारे दृश्य देख पाएं। चलिए आज हम आपको बताते हैं दूरदर्शन, उसके लोगो और लोगो को बनाने वाले देबाशीष भट्टाचार्या के बारे में कुछ खास बातें-
विज्ञापन

5 मिनट के न्यूज बुलेटिन से हुआ था शुरू

2 of 11
दूरदर्शन को भारत सरकार द्वारा नामित प्रसार भारती के अंतर्गत चलाया जाता है। 5 मिनट के न्यूज टेलिकास्ट से शुरू हुआ दूरदर्शन कुछ ही समय में लोगों के मनोरंजन का साधन बन गया। जिसमें लोगों को महत्वपूर्ण जानकारी दी जाती है। दूरदर्शन पर आने वाले कार्यक्रम कृषि दर्शन के बारे में भला कौन नहीं जानता। भारतीय टेलीवीजन पर चलने वाले यह सबसे लंबा प्रोग्राम है।
विज्ञापन

70, 80 और 90 के दशक के हर व्यक्ति को याद आता है वो वक्त

3 of 11
70, 80 और 90 के दशक में पले बढ़े लोगों के लिए टीवी सेट आने की खुशी का अंदाजा आज के जमाने के बच्चे नहीं लगा सकते। घर में पहले टीवी सेट आना और बाद में केबल का भी आ जाना किसी सपने से कम नहीं था। रविवार को धार्मिक कार्यक्रम देखने के लिए घर के सभी लोगों का टीवी सेट के आगे बैठ जाना, उस दशक को जीने वाले सभी लोग याद करते होंगे।

फिल्मी गानों से तो मानो पूरा दिन ही महक उठता था। आज की तरह नहीं कि हर चीज फोन पर हाजिर हो। परिवार के लोगों को भी अब साथ बैठने का वक्त कहां मिल पाता है। उस दौरान सबसे ज्यादा खुशी होती थी उस दोस्त के घर जाने की जिसके घर पर टीवी सेट होता था। भारत पाकिस्तान के मैच के बीच जब केबल चला जाए तो रोमांच कई गुना तक बढ़ जाता था।

8 दोस्तों ने किया तैयार

4 of 11
दूरदर्शन की आंख (लोगो) को एनआईडी के पूर्व छात्र देबाशीष भट्टाचार्य ने अपने दोस्तों के साथ तैयार किया था। जब दूरदर्शन ने ऑल इंडिया रेडियो से अलग होने का फैसला किया, तो उस वक्त उनको अपना अलग लोगो भी चाहिए था। इसकी जिम्मेदारी एनआईडी के छात्रों को दी गई थी।
विज्ञापन

इंसान की आंख के आकार का लोगो

5 of 11
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार देबाशीष ने इंसान की आंख के आकार का लोगो बनाया। इसके दोनों तरफ उन्होंने दो घुमावदार कर्व यिन और यांग के आकार बनाए और अपने अध्यापक विकास सतवालेकर को सौंप दिया।
विज्ञापन

तैयार हुए थे कई डिजाइन

6 of 11
इन आठ छात्रों ने और उनके 6 फैकल्टी मेंबर्स ने कई डिजाइन तैयार किए। इनमें से देबाशीष के लोगों को चुना गया। लोगो का चुनाव तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था।
विज्ञापन

आज ये आंख जानी जाती है डीडी आई के नाम से

7 of 11
देबाशीष के इस खास डिजाइन को लोगो का रूप देने के लिए इसमें इनीमेशन की आवश्यकता थी। एनीमेशन का काम किया एनआईडी के ही एक अन्य छात्र आरएल मिस्त्री ने। मिस्त्री ने पहले तो देबाशीष के लोगो को कैमरे से शूट किया और बाद में उसे तब तक रोटेट किया, जब तक उसने लोगो का अंतिम रूप नहीं ले लिया। इसी आंख को आज हम डीडी आई के नाम से जानते हैं।

लोगो के साथ संगीत भी

8 of 11
लोगो के साथ चलने वाले संगीत को पंडित रवि शंकर ने उस्ताद अहमद हुसैन खान के साथ मिलकर तैयार किया। लोगो के साथ थीम संगीत को पहली बार 1 अप्रैल 1976 को टेलीवीजन स्क्रीन पर सुनाया गया।

80 और 90 के दशक में बदलाव

9 of 11
इस सिम्बल में 80 और 90 के दशक में बदलाव हुए। जब डीडी स्पोर्टस, डीडी न्यूज और कुछ रीजनल चैनल आ गाए। डीडी स्पोर्टस के मोंटाज में डिस्कस फेंकते हुए एथलीट को दिखाया गया था। जो कि बाद में दूरदर्शन का ही सिंबल बन गया।

विभिन्न संस्कृतियों को दर्शाता सिंबल

10 of 11
विभिन्न संस्कृतियों में सिंबल नया संदेश देता था। भट्टाचार्य ने एक मीडिया वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में कहा था कि लोगो और प्रतीक को बेहद सरल रखा गया ताकि वह सभी की समझ में आ सके।
विज्ञापन

लोगो के साथ ये भी लिखा होता था

11 of 11
लोगो को साथ शुरुआती दिनों में एक लाइन भी लिखी होती थी। वह लाइन थी सत्यम शिवम सुंदरम। इसे बाद में हटा लिया गया था।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें