यूनिसेफ के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. भृगु कपूरिया ने कहा, 'भारत की गिनती उन देशों में होती है जहां बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाए जा रहे हैं। सालभर में करीब 26 मिलियन नवजातों को इसके तहत वैक्सीन लगाए जा रहे हैं। मगर बिना साक्ष्य के इसे लेकर ऐसी अफवाहें फैलाई जा रही हैं जिससे सरकार की ओर से चलाए जा रहे टीकाकरण अभियान प्रभावित होते हैं।'
इसलिए देश में बढ़ रहे हैं स्तन कैंसर के मामले
वरिष्ठ पत्रकार आरती धर ने कहा कि देश की ज्यादातर शादी-शुदा महिलाओं में स्तन कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह कि मां बनने के बाद कई महिलाएं 6 महीने बाद अपने बच्चों को स्तनपान कराना बंद कर देती हैं। माताओं को कम से कम 3 साल तक बच्चों को स्तनपान कराना चाहिए, क्योंकि इसी दौरान बच्चों के मस्तिष्क का 80 फीसदी विकास होता है।
वहीं शिशु दुग्ध विकल्प अधिनियम 1992 और संशोधित अधिनियम 2003 के तहत कोई भी मां के दूध के विकल्प के तौर पर किसी भी डब्बा बंद दूध, शिशु आहार या दूध की बोतलों का उत्पादन, आपूर्ति, वितरण या प्रचार नहीं कर सकता। अगर इसे बढ़ावा देते या दो साल के छोटे बच्चे को ऐसा आहार देते हुए कोई स्वास्थ्य कर्मी पाया गया, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।'
गर्भवती महिलाओं को पड़ती है खून की ज्यादा जरूरत
आरती धर ने कहा कि गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी के दौरान सबसे ज्यादा खून की जरूरत पड़ती है, लेकिन उनके खुद के रिश्तेदार जैसे पति, मां, सास-ससुर व भाई आदि रक्तदान करने से भाग जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि लोगों के दिमाग में डर बैठा है कि खून देने से वो कमजोर हो जाएंगे, जबकि ऐसा नहीं है।
भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रोफेसर डॉ. गीता बामजई ने कहा कि स्वास्थ्य पर जारी किए गए विभिन्न शोधपत्रों को पढ़ने में पत्रकार काफी उदासीन रहते हैं। आम जनता को राजनीतिक खबरें नहीं बल्कि विज्ञान से जुड़ी खबरें ज्यादा प्रभावित करती है।
किसी भी शोध को छापने से पहले उसकी विश्वसनीयता परखनी चाहिए। इसके लिए सही आंकड़ों को पेश करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसी भी अध्ययन को आधा-अधूरा छापने से अर्थ का अनर्थ होने का खतरा बना रहा है। लिहाजा, रिसर्च रिपोर्ट के हर अहम बिंदु को लोगों के सामने रखना चाहिए।
कैस पर सिखाएं रिपोर्टिंग के गुर
स्वास्थ्य बीट कवर करने वाले पत्रकारों को वरिष्ठ पत्रकार एमएच गजाली, प्रमोद जोशी व यूनिसेफ की न्यूट्रिशन एक्सपर्ट गायत्री सिंह ने भी रिपोर्टिंग के गुर सिखाएं। एमएच गजाली ने पत्रकारों को आने वाली दिक्कतें व टीकाकरण की परेशानियों के कारणों के बारे में बताया।
कार्यशाला का संचालन कर रहे अमर उजाला के वरिष्ठ संपादक संजय अभिज्ञान ने कहा कि 'कैस' की विधा अनुसंधान और शोध प्रस्तावों को आंकने की कला है। उन्होंने कहा, 'सप्रमाण लेखन ही कुंजी है। शोध या अनुसंधान से किसी कंपनी या समूह यी लॉबी को फायदा होता हो तो उसका उल्लेख संबंधित रिपोर्ट में जरूर करना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि कई बार दवा कंपनियां अपना प्रचार प्रसार करने के लिए फर्जी शोध करवाती हैं। लिहाजा, किसी भी अध्ययन, खास तौर से जो स्वास्थ्य संबंधी विषयों से जुड़े हों, उनके नतीजों को प्रकाशित करने से पहले पत्रकारों को अच्छी तरह उनकी पड़ताल करने की जरूरत है।