वर्ष 2002 में पहली बार सांसद बने ज्योतिरादित्य ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत पिता माधवराव सिंधिया के निधन के बाद की थी। 18 सितंबर, 2001 को माधवराव की एक हवाई हादसे में मृत्यु हो गई थी। उस दौरान माधवराव गुना से लोकसभा सांसद थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने पिता की लोकसभा सीट से ही पहली बार चुनाव लड़ा और फरवरी 2002 में साढ़े चार लाख से ज्यादा वोटों से जीत हासिल कर संसद पहुंचे थे।
प्राइवेट नौकरी से केंद्रीय मंत्री
ज्योतिरादित्य सिंधिया राजनीति में आने से पहले एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे। दरअसल, बड़े महाराज के नाम से मशहूर माधवराव सिंधिया अपने बेटे की पढ़ाई-लिखाई और करियर को लेकर चिंतित रहा करते थे। वे चाहते थे कि उनके बेटे के साथ राजा-महाराजाओं की तरह व्यवहार न हो। ज्योतिरादित्य के बचपन से ही बड़े महाराज ने इसका खास ध्यान रखा और उन्हें आम युवकों की तरह शिक्षा-दीक्षा और नौकरी करने के लिए प्रेरित किया। यही कारण था कि ज्योतिरादित्य ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद एक प्राइवेट कंपनी में अपनी सेवाएं देनी शुरू कर दी थी। हालांकि, पिता के निधन के बाद उन्होंने राजनीति को ही अपना करियर बना लिया।
माधवराव ने अपने बेटे को दून स्कूल में पढ़ने को भेजा था। उनका मानना था कि सिंधिया स्कूल ग्वालियर में उनके बेटे को ज्यादा लाड़-प्यार मिलेगा। स्कूली शिक्षा पूरी होने पर वे ज्योतिरादित्य को अपने साथ दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज और इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी लेकर गए। ऑक्सफोर्ड में ज्योतिरादित्य का एडमिशन नहीं हो पाया तो अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में उनका दाखिला कराया।
सिंधिया ने यहां दीं अपनी सेवाएं
वर्ष 1991 में पढ़ाई पूरी करने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लॉस एंजिल्स में अंतरराष्ट्रीय कंपनी मैरिल लिंच के साथ अपने करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र संघ में भी काम किया। अगस्त, 1993 में भारत लौटने के बाद उन्होंने मुंबई में मॉर्गन स्टेनले कंपनी के लिए भी काम किया।