चेन्नई की जिला अदालत ने एक बच्चे को एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाने पर राजकीय बाल स्वास्थ्य संस्थान और चिकित्सालय के डीन को 20 लाख रुपये जुर्माना चुकाने का आदेश दिया है। अपर जिला जज वी थेनमोजे ने आदेश में कहा कि आरोपी अस्पताल ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका, जो बताए कि चढ़ाए गए खून का परीक्षण हो चुका था और उसके एचआईवी या अन्य जीवाणु से संक्रमित नहीं होने की पुष्टि हुई थी। अदालत ने डॉक्टरों को चिकित्सकीय लापरवाही का दोषी माना।
अपने बचाव में अस्पताल ने औषध एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 के हवाले से कहा था कि संबंधित मामले के संबंधित दस्तावेज पांच वर्ष तक ही संभाल कर रखे गए थे, बाद में उन्हें नष्ट कर दिया गया था। हालांकि अस्पताल दस्तावेज नष्ट करने का कोई साक्ष्य नहीं दे पाया।
अदालत ने कहा कि अस्पताल के डीन चिकित्सकों व कर्मचारियों की नियुक्ति करते हैं ऐसे में मुआवजा चुकाने का दायित्व उन पर होगा। इस रकम पर केस दायर होने की तारीख से छह प्रतिशत ब्याज भी देना होगा। मुआवजे की मांग करते हुए मुकदमा करने वाली महिला ने बताया था कि 1998 में उसके सात महीने के बच्चे को दस्त और उलटियां होने के बाद सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाया गया था।
चिकित्सकों ने कहा कि उसकी बड़ी और छोटी आंत उलझ गई हैं, इसलिए सर्जरी करनी होगी। सर्जरी के दौरान उसे रक्त चढ़ाया गया। अस्पताल से लौटने के दो दिन बाद ही बच्चा बीमार हुआ, उसे फिर भर्ती करवाया गया। इलाज के बाद लौटे बच्चे को इस बार गले में सूजन और बीमारी हुई, जिस पर डॉक्टरों ने विस्तृत जांच की सिफारिश की। सामने आया कि वह एचआईवी से संक्रमित हो चुका है।