सबूतों को ध्यान में रखते हुए ही किया जा सकता फैसला
न्यायाधीश लाहोटी ने कहा कि जब यह मुद्दा बंबई उच्च न्यायालय के समक्ष उठाया गया तो उसने कहा कि शीर्ष अदालत ने एएसजी के इस सुझाव को स्वीकार कर लिया कि उक्त मुद्दे पर सुनवाई के समय विचार किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अभियोजन पक्ष ने 304 गवाहों से पूछताछ की थी इसके बाद ही कुलकर्णी ने आवेदन दायर किया। इसमें कहा गया कि मंजूरी की वैधता या वैधता पर 'सबूतों' (पूरे सबूत) को ध्यान में रखने के बाद ही फैसला किया जा सकता है।
खत्म नहीं हुई अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही
न्यायाधीश ने कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही खत्म नहीं हुई है, मंजूरी देने वाले एक अन्य प्राधिकारी से पूछताछ नहीं की गई है और मंजूरी के लिए प्रस्ताव भेजने वाले जांच अधिकारी का बयान भी अभी खत्म नहीं हुआ है। इसलिए मुझे विशेष लोक अभियोजक द्वारा उठाए गए इस बिंदु में दम नजर आता है कि सभी सबूतों के पूरा होने से पहले मंजूरी के बिंदु पर अलग से फैसला नहीं किया जा सकता है।
मंजूरी के मुद्दे पर टुकड़ों में विचार नहीं किया जा सकता
न्यायाधीश ने याचिका को 'समय पूर्व' बताते हुए और इसे खारिज करते हुए कहा, 'टुकड़ों में मंजूरी के मुद्दे पर विचार नहीं किया जा सकता और फैसला नहीं किया जा सकता और उस पर फैसला करने के लिए पूरे साक्ष्य पर विचार करना होगा, जो अभी खत्म नहीं हुआ है।
क्या हुआ था मामला और कौन-कौन आरोपी
मुंबई से करीब 100 किलोमीटर दूर नासिक जिले के मालेगांव में एक मस्जिद के पास 29 सितंबर 2008 को एक मोटरसाइकिल में बंधे विस्फोटक उपकरण में विस्फोट होने से छह लोगों की मौत हो गई थी और 200 से अधिक लोग घायल हो गए थे। इस मामले में मुकदमे का सामना कर रहे आरोपियों में भाजपा की लोकसभा सदस्य प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, सुधाकर द्विवेदी, मेजर रमेश उपाध्याय (सेवानिवृत्त), अजय राहिरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी शामिल हैं।
और भी पढ़ें...