सुप्रीम कोर्ट ने 19 साल बाद गुरुग्राम के वजीराबाद से सटी 436 बीघा 18 बिस्वा विवादित जमीन पर ग्राम पंचायत के मालिकाना हक को बहाल कर दिया। अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के 2007 के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि यह जमीन 'शामिलात देह' यानी गांव की साझा जमीन है और इस पर ग्राम पंचायत का ही अधिकार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में पट्टियों के नाम दर्ज होने से जमीन का मूल स्वरूप नहीं बदल जाता।
कोर्ट ने इस फैसले में क्या अहम टिप्पणी की?
गांव की साझा जमीन की अहमियत पर दिए गए अहम फैसले में जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, 'जमीन को 'नया सोना' माना जाता है, खासकर तब जब ऐसी ज़मीन गुरुग्राम जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहरी इलाकों के आसपास हो।' पीठ की ओर से 85 पन्नों का फैसला लिखते हुए जस्टिस संजय कुमार ने कहा कि विवादित जमीन हरियाणा कॉमन लैंड्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1961 के तहत 'शामिलात देह' यानी गांव की साझा जमीन थी। हाई कोर्ट ने इसे निजी जमीन मानने में गलती की, क्योंकि उसने केवल राजस्व रिकॉर्ड में गांव की विभिन्न पट्टियों (मालिक समूहों) के नाम दर्ज होने को आधार बना लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर क्या कहा?
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि इसलिए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का 24 अगस्त, 2007 का साझा फैसला तथ्यों और कानून, दोनों की कसौटी पर सही नहीं ठहरता। अपीलें स्वीकार की जाती हैं और उक्त फैसला रद्द किया जाता है। साथ ही 13 सितंबर, 1955 को वज़ीराबाद ग्राम पंचायत के पक्ष में किए गए म्यूटेशन की पुष्टि की जाती है, जिसका लाभ उसके उत्तराधिकारी नगर निगम, गुरुग्राम को मिलेगा।'
1955 के म्यूटेशन को चुनौती क्यों खारिज हुई?
फैसले में कहा गया कि वादी 13 सितंबर, 1955 को वज़ीराबाद ग्राम पंचायत के पक्ष में हुए म्यूटेशन को चुनौती देने के लिए कोई ठोस कानूनी आधार पेश नहीं कर सके। अदालत ने पाया कि संबंधित जमीन 'शामिलात पट्टी' नहीं, बल्कि हैदरपुर की 'शामिलात देह' का हिस्सा थी। हालांकि पट्टी चित्रू, रामरतन और मेधा, पट्टी सदासुख तथा पट्टी अहमद अली खान के हिस्सेदारों को अपने-अपने हिस्से के अनुसार बंटवारा कराने का अधिकार था, लेकिन 26 जनवरी, 1950 से पहले ऐसा कोई बंटवारा नहीं हुआ। इसी कारण 436 बीघा 18 बिस्वा जमीन "शामिलात देह" के रूप में बनी रही और उस पर हरियाणा कॉमन लैंड्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1961 की धारा 2(g)(1) लागू हुई, जिसके तहत यह जमीन वज़ीराबाद ग्राम पंचायत के अधिकार में आ गई।
पूरा विवाद आखिर था क्या?
यह मामला हैदरपुर के निर्जन गांव (बे-चिराग मौज़ा) की 436 बीघा 18 बिस्वा जमीन से जुड़ा था। यह इलाका वर्तमान गुरुग्राम में वज़ीराबाद गांव से सटा हुआ है। पंजाब विलेज कॉमन लैंड्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1953 लागू होने के बाद वर्ष 1955 में इस जमीन का म्यूटेशन ग्राम पंचायत के नाम दर्ज कर दिया गया था।
निजी पक्षों ने अदालत में क्या दलील दी थी?
कई दशक बाद गांव के मूल मालिकों के जरिए दावा करने वाले कुछ लोगों ने इस म्यूटेशन को चुनौती दी। उनका कहना था कि यह जमीन निजी पट्टियों की थी और कभी भी ग्राम पंचायत के अधिकार में नहीं आई। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आजादी से पहले के पंजाब से लेकर मौजूदा कानूनी व्यवस्था तक गांव की साझा जमीनों के इतिहास का विस्तार से विश्लेषण किया। अदालत ने प्रथागत कानून, 'शरत वाजिब-उल-अर्ज' (गांव के रीति-रिवाजों और अधिकारों का दस्तावेज) के महत्व तथा साझा जमीनों से जुड़े कानूनों के पीछे की विधायी मंशा की भी समीक्षा की।
गांव की साझा जमीन को लेकर अदालत ने क्या कहा?
पीठ ने कहा कि गांव की साझा जमीनें ऐतिहासिक रूप से सामुदायिक उपयोग के लिए सुरक्षित रखी जाती थीं। आजादी के बाद बनाए गए कानूनों का उद्देश्य भी यही था कि ऐसी जमीनों पर ग्राम पंचायतों का अधिकार बना रहे ताकि उनका उपयोग गांव के लोगों के हित में हो सके।
राजस्व रिकॉर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहा?
हाई कोर्ट का फैसला पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में मालिकों के नाम दर्ज होने या "हसब रसद" (हिस्सेदारी के अनुसार) जैसी प्रविष्टियों से उस जमीन का मूल स्वरूप नहीं बदल जाता, जिसे पहले से ही 'शामिलात देह' के रूप में दर्ज किया गया हो।
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अंतिम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
अदालत ने वज़ीराबाद ग्राम पंचायत के पक्ष में वर्ष 1955 के म्यूटेशन को बहाल करते हुए विवादित 436 बीघा 18 बिस्वा जमीन पर ग्राम पंचायत के मालिकाना हक की पुष्टि कर दी। इससे 19 वर्षों से लंबित कानूनी विवाद पर अंतिम मुहर लग गई।