इस हमले के सूत्रधार मो. उमर फारुख, समीर अहमद डार और शकीर बशीर की योजना थी कि सुरक्षा बल, खासतौर पर सीआरपीएफ का बड़ा वाहन जैसे ही दिखे, उस पर हमला करना है। छह फरवरी को हमले की पूरी तैयारी थी। मुख्य सड़क के निकट आतंकियों ने सुरक्षा बलों के वाहनों का इंतजार भी किया, लेकिन कई हिस्सों में भारी बर्फबारी के चलते उस रोज बड़ा काफिला पुलवामा से नहीं गुजरा। इसके बाद दो-चार नहीं, बल्कि उन्हें 188 से ज्यादा घंटे तक इंतजार करना पड़ा।
14 फरवरी को आदिल अहमद डार जो कि पहले से ही ईको कार की सीट पर तैयार बैठा था, ने सीआरपीएफ जवानों से भरी बस को टारगेट कर दिया। नतीजा, 40 जवान शहीद हो गए। एनआईए की 13,500 पन्नों की चार्जशीट में कई अहम खुलासे हुए हैं। पाकिस्तानी आईएसआई और वहां के आतंकी सरगना व जैश-ए-मोहम्मद के चीफ मसूद अजहर ने कैसे कश्मीर घाटी के आतंकियों को पुलवामा हमले के लिए तैयार किया था, ये सब बातें चार्जशीट में सिलसिलेवार बताई गई हैं।
कश्मीर के आतंकियों का घुसपैठ के जरिए पाकिस्तान जाना और उसके बाद वहां से अफगानिस्तान पहुंच कर आईईडी तैयार करने की ट्रेनिंग लेना, यह सब इतना आसान नहीं था। इसके पीछे पाकिस्तान की एजेंसियों का पूरा सहयोग रहा है। जम्मू के सांबा-कठुआ सेक्टर के दूसरी तरफ पाकिस्तान के शाकरगढ़ में आतंकियों का लान्चिंग पैड तैयार किया गया था। अफगानिस्तान से ट्रेनिंग लेकर लौटे आतंकियों को इसी रास्ते भारतीय सीमा में धकेला गया।
दिसंबर 2018 के दौरान फारुख ने जम्मू-कश्मीर नेशनल हाइवे की रेकी की थी। उस वक्त बड़े काफिले के लिए रोड ओपनिंग पार्टी गश्त करती थी, लेकिन काफिले के दौरान सिविल यातायात बंद हो जाए, ऐसा नहीं था। उसने देखा कि कश्मीर रूट पर सुरक्षा बलों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। उसने यह भी देखा कि एक बड़े काफिले में फिदायीन हमले को लेकर कैसे प्रबंध रहते हैं। आमने-सामने की मुठभेड़ संभव नहीं थी, फारुख ने यह बात अच्छे से समझ ली थी।
रोजाना खुद आते थे सुरक्षाबलों का मूवमेंट जांचने
मोहम्मद फारुख ने फरवरी 2019 में शकीर बशीर को रोड मूवमेंट जांचने की जिम्मेदारी सौंपी थी। खास बात है कि छह फरवरी से लेकर हमले के दिन तक आदिल अहमद डार दो सौ किलो विस्फोटकों से भरी कार में बैठ जाता था। कार को कई बार स्टार्ट किया जाता था। खासतौर पर गाड़ी की हैवी बैटरी पर सबसे ज्यादा ध्यान रहता था। शकीर बशीर ने विस्फोटक एक जगह लाने की जिम्मेदारी संभाली थी। हमले से पहले वह रोजाना पुलवामा हाईवे पर सुरक्षा बलों का मूवमेंट जांचता था।
एनआईए की चार्जशीट में बताया गया है कि छह फरवरी से लेकर 14 फरवरी तक मोहम्मद फारुख और पाकिस्तानी हैंडलर राउफ अजगर के बीच कई बार बातचीत हुई थी। उन्हें यह निर्देश मिले थे कि सुरक्षा बलों के छोटे वाहन को निशाना नहीं बनाना है, बड़ा वाहन ही टारगेट करना है। पाकिस्तानी हैंडलर ने उन्हें बस या ऐसे ट्रक, जिसमें जवान बैठे हों, उसे टारगेट पर लेने को कहा था। हमले वाले दिन भी आतंकियों ने पुलवामा से बाहर जाकर सुरक्षा बलों के काफिले की रेकी की थी।
यह सूचना पुख्ता होने के बाद कि सुरक्षा बलों का बड़ा काफिला सड़क पर है, तो ही आदिल अहमद डार को जाने का आदेश दिया गया। उसे हमला करने की सूचना फोन पर नहीं, बल्कि दूसरे आतंकी ने खुद जाकर दी थी। इशारा मिलते ही आदिल अहमद डार ने 14 फरवरी को सीआरपीएफ बस में ईको कार की टक्कर मार दी। इस हमले में डार की मौत के साथ साथ सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे।