वीरशैव कौन हैं?
वहीं, सोलहवीं शताब्दी में बने वीरशैव वासवन्ना की जगह पांच पीठों को सर्वोच्च स्थान देते हैं जिन्हें पंचाचार्यों ने स्थापित किया था। वे शिवलिंग की ही नहीं, बल्कि शिवजी की मूर्ति पूजा भी करते हैं। वे वेद, पुराण, उपनिषद सभी हिंदू धर्मग्रंथों को मानते हैं। हालांकि उनका अपना भी एक धर्मग्रंथ कन्नड़ भाषा में है - सिद्धांत शिखामणि। वे जाति व्यवस्था को मानते हैं। लिंगानुभेद करते हैं। उनके यहां शव का दाह संस्कार किया जाता है। उनका मानना है कि पंचाचार्यों ने ही लिंगायत समुदाय की नींव रखी और वासवन्ना महज एक समाज सुधारक थे। कर्नाटक की आबादी का तीन फीसदी हिस्सा वीरशैव है। वे केवल कर्नाटक में ही रहते हैं।
भ्रम क्यों?
दरअसल, महाराजा बिजाला ने लिंगायतों को मान्यता नहीं दी थी। वासवन्ना के वचनों को जलवा दिया था। दूसरी ओर, हिंदू धर्म से लिंगायत बनने वाले बहुत से लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं को साथ ले आए। इसलिए, अब बहुत से लिंगायत खुद को हिंदू ही मानते हैं।
कर्नाटक में माना जाता है कि उसी की सरकार बनती है, जिसके साथ लिंगायत होते हैं। चाहे वह जनता दल के रामकृष्ण हेगड़े हों या कांग्रेस के वीरेंद्र पाटिल। लेकिन
राजीव गांधी द्वारा पाटिल का अपमान कर मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद से लिंगायतों ने कांग्रेस को वोट नहीं दिए। हेगड़े के बाद येदियुरप्पा उनके पसंदीदा नेता रहे।
सिद्धारमैया के कदम का क्या असर पड़ेगा?
सिद्धारमैया ने लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता दी है, वीरशैव को नहीं। इससे वीरशैव नाराज हैं और सिद्धारमैया पर हिंदू धर्म को बांटने का आरोप लगा रहा है। लेकिन लिंगायत किसी हद तक खुश हैं। वे अपने को वैसे ही अलग धर्म मानते हैं जैसे जैन, बौद्ध या सिख। यही वजह है बीएस येद्दियुरप्पा ने मुख्यमंत्री रहते हुए लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देने की सिफारिश की थी। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने उसे खारिज कर दिया था लेकिन इस बार दोनों दलों ने अपने रुख बदल लिए हैं। लिंगायत किसका रुख पसंद कर रहे हैं, यह 12 मई को मतदान से ही पता चलेगा।