प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के मुंबई ज़ोनल ऑफिस-I ने पिछले सप्ताह 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), 2002' के तहत महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर में 8 जगहों पर तलाशी अभियान चलाया है। यह कार्रवाई धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह और अन्य लोगों के ख़िलाफ कथित फर्ज़ी सीएसआर डोनेशन रैकेट के मामले में की गई। ईडी ने तलाशी के दौरान लगभग 21 लाख रुपये नकद जब्त किए हैं। साथ ही जांच एजेंसी को कई आपत्तिजनक दस्तावेज और डिजिटल डिवाइस भी मिले हैं। आरोपी धर्मेंद्र कुमार, जो 12वीं तक पढ़ा था, उसके पास कोई मेडिकल योग्यता नहीं थी, फिर उसने 30 साल तक डॉक्टर बनकर फर्जी 'सीएसआर' डोनेशन रैकेट चलाया। विभिन्न संस्थाओं से 200 करोड़ रुपये जुटा लिए।
ईडी ने पीएमएलए के तहत इस केस की जांच जुहू पुलिस स्टेशन में धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की है। उन पर महाराष्ट्र मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 1961, नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट, 2019 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत अपराधों का आरोप था। इनमें आईपीसी की धारा 420, 467, 471 और 475 से जुड़े अपराध भी शामिल हैं, जो पीएमएलए के तहत 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' (सूचीबद्ध अपराध) हैं।
जांच से पता चला है कि धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह के पास कोई मान्यता प्राप्त मेडिकल योग्यता या मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन नहीं था। उन्होंने केवल 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। इसके बावजूद, उन्होंने कथित तौर पर खुद को डॉक्टर बताया। लगभग तीन दशकों तक 'डॉक्टर' का टाइटल इस्तेमाल किया। खुद को डॉक्टर बताने और इस टाइटल से जुड़ी साख का फ़ायदा उठाते हुए, उन्होंने चैरिटेबल ट्रस्ट और संस्थाओं का एक नेटवर्क बनाया और चलाया। ये संस्थाएं मुख्य रूप से हेल्थकेयर पर केंद्रित सीएसआर गतिविधियों में शामिल थीं। इनके जरिए आरोपी धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह ने पीएसयू और प्राइवेट कॉर्पोरेट से बड़ी मात्रा में सीएसआर फंड जुटाए।
तलाशी में शुरुआती तौर पर चैरिटेबल ट्रस्ट, ट्रस्टी, सीएसआर एजेंट, बिचौलिये और इक्विपमेंट सप्लायर का एक नेटवर्क सामने आया है, जो सीएसआर फंड के गलत इस्तेमाल और रीसाइक्लिंग में शामिल थे। देश भर की कम से कम 40 पीएसयू और पब्लिक सेक्टर बैंकों ने आरोपी द्वारा चलाए जा रहे ट्रस्टों को सीएसआर डोनेशन दिया था। कई प्रोजेक्ट या तो अधूरे थे या मिले फंड के अनुपात में पूरे नहीं किए गए थे, जबकि वेंडर के बिल बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए। अतिरिक्त फंड फर्जी या शेल कंपनियों के जरिए ट्रांसफर किए गए। ईडी के मुताबिक, सीएसआर फंडिंग में मदद करने वाले बिचौलियों को कथित तौर पर रिश्वत और कमीशन दिया गया था।
आगे की जांच से पता चला है कि इन ट्रस्टों को अस्पतालों और हेल्थकेयर संस्थानों के लिए हाई-एंड मेडिकल मशीनरी और इक्विपमेंट खरीदने के लिए फंड देने के ज़रिया के तौर पर दिखाया गया था। जब ऐसे संस्थानों ने ज़रूरी इक्विपमेंट खरीदने के लिए फंड की कमी का हवाला दिया, तो उन्हें संबंधित इलाके के जन-प्रतिनिधियों से जोड़ा गया, जिन्होंने खास तौर पर सिंह द्वारा चलाए जा रहे ट्रस्टों के जरिए ऐसे प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग की सिफारिश की।
जांच से पता चला है कि पीएसयू ने मुख्य रूप से जन-प्रतिनिधियों या उनके स्टाफ से मिली ऐसी सिफारिशों के आधार पर इन ट्रस्टों को सीएसआर डोनेशन दिया था। प्राइवेट कंपनियों से मिले सीएसआर योगदान का एक बड़ा हिस्सा छोटा कमीशन काटकर योगदानकर्ताओं को कैश में वापस कर दिया गया था। तलाशी में सीएसआर एजेंट और बिचौलियों का एक नेटवर्क भी सामने आया है, जिन्होंने सीएसआर फंड को ट्रस्टों तक पहुंचाया, जिन्हें बाद में मार्केट ऑपरेटरों द्वारा कंट्रोल की जाने वाली शेल कंपनियों के जरिए ट्रांसफर किया गया।
इनमें से ज़्यादातर कंपनियों की पहचान कई सीएसआर धोखाधड़ी की जांच में भी की गई है। इस तरह, CSR सिस्टम का इस्तेमाल अकाउंटेड फंड को अनअकाउंटेड कैश में बदलने के ज़रिया के तौर पर किया गया। इस सिस्टम के जरिए लगभग 200 करोड़ रुपये का सीएसआर फंड ट्रांसफर किया गया।