आयोग की बेंच में उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष डीके जैन, सदस्य रेखा गुप्ता और एम श्रीशा शामिल थे। उन्होने कहा, मरीज की खराब हालत उसके इलाज का रिकॉर्ड सबूत है कि डॉक्टर एसएम रस्तोगी ने उसे डिस्चार्ज कर दिया था। जो डॉक्टर उनका इलाज कर रहा था उसके लेटर हेड पर लिखा है कि इसे कानूनी प्रक्रिया के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। इस वजह से प्रिस्क्रिप्शन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है और यह पूरी तरह से उचित नहीं है।
कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए गया निवासी सिंह ने 15 बार देश की राजधानी दिल्ली की यात्रा की। उन्होंने कथित तौर पर डॉक्टर सुधीर मोहन कांत पर
चिकित्सीय लापरवाही का आरोप लगाया। यह वही डॉक्टर हैं जिन्होंने 14 अगस्त, 2005 को उनकी पत्नी के पेट की सर्जरी की थी। सिंह ने बताया, आप मुझे अपने सामने खड़ा हुआ देख रहे हैं लेकिन मानसिक, शारीरिक और आर्थिक तौर पर मुझे लगता है कि मैं मर चुका हूं।
अपनी पत्नी के कोमा में जाने के बाद सिंह ने 2006 में जिला फोरम में याचिका दायर की। यहां से उन्हें 11 जुलाई, 2007 को 10 लाख रुपए मुआवजे के तौर पर मिले। हालांकि राज्य आयोग ने इस राशि को 30 सितंबर, 2011 को घटाकर 4 लाख रुपए कर दिया क्योंकि आदेश के खिलाफ सर्जन की अपील की थी। इसके बाद जनवरी 2012 को सिंह ने शशि शंकर और पूजा मोहनानी के जरिए आयोग में पुनर्विचार याचिका दायर की।
रामाधार सिंह की पत्नी को डॉक्टर सुधीर मोहन कांत ने ऑपरेशन किया लेकिन वह फिर से होश में नहीं आ पाईं। उन्हें ऑक्सीजन मास्क लगाया गया क्योंकि उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। कई घंटों तक बेहोश रहने के बाद उनकी दूसरी सर्जरी की गई और सिंह ने उन्हें कागजों पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा। उन्हें बाद में कहा गया कि वह वह जल्द ही होश में आ जाएंगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अपनी पत्नी को वापस होश में लाने की सिंह की सारी कोशिशें नाकाम रहीं। इसके बाद वह दर्जनभर डॉक्टरों के पास गए जिसमें डॉक्टर रोहतगी भी शामिल थे।