गांव में पढ़ने के लिए महिलाओं को एक जगह एकत्रित करना बहुत मुश्किल काम होता है लेकिन कर्वे ने इसके लिए बहुत प्रयास किए हैं। वह अपने छात्रों को एक जगह एकत्रित करने के लिए प्रेरणादायक बातें बताते हैं।
बता दें कर्वे की कक्षा में 52 साल और इससे अधिक उम्र की महिलाएं भी उपस्थित रहती हैं। वह उनके साथ नर्सरी के बच्चों की तरह व्यवहार करते हैं। उन्हें कक्षा में आने के लिए मिठाई और पेन भी देते हैं। उनके लिए महिलाओं को संस्कृत शिक्षा देना ही जीवन का उद्देश्य है। महिलाएं घर के सारे काम निपटाकर और बच्चों को स्कूल छोड़ने के बाद पढ़ने आती हैं।
कर्वे की 62 साल की छात्रा माधुरी कावडे का कहना है कि वह उन्हें होमवर्क नहीं देते ताकि वह कक्षा में आना न छोड़ दें। वह सभी महिलाओं की परिवार के प्रति जिम्मेदारी को बखूबी समझते हैं। महिलाओं ने 6 महीने का संस्कृत भारती कोर्स किया है। जिसके चार लेवल होते हैं। प्रत्येक लेवल में उन्हें लिखित परीक्षा देनी होती है।
महिलाओं ने परीक्षा में 100 में से 80 और 90 अंक प्राप्त किए हैं। गांव में महिलाओं से कहा जाता है कि मासिक धर्म के समय श्लोकों को न पढ़े और अगर ऐसा करेंगी तो उन्हें सजा दी जाएगी।
कर्वे की एक अन्य छात्रा का कहना है कि मासिक धर्म के समय जब हम अपनी बेटियों को स्कूल जाने से नहीं रोकते तो फिर हम क्यों अपनी कक्षा में न जाएं? हमारे लिए तो वह भी स्कूल ही है। उन्होंने कहा कि आज के समय में वह आत्मविश्वास के साथ पूजा करती हैं।