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प्रथम विश्व युद्ध में भारत: वो हीरो जिन्हें इतिहास ने भुला दिया

Sun, 11 Nov 2018 02:41 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रथम विश्व युद्ध
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आज प्रथम विश्व युद्ध को खत्म हुए 100 साल पूरे हो गए हैं। यह युद्ध साल 1918 में खत्म हुआ था। इस युद्ध की जब भी बात की जाती है तो उसमें जर्मनी, फ्रांस आदि देशों का नाम सामने आता है। लेकिन भारत का नाम तो मानो युद्ध के इतिहास से मिटा ही दिया गया हो। लेकिन आज हम आपको इस युद्ध में भारत के योगदान के बारे में बताने जा रहे हैं-
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14 लाख भारतीय सैनिकों ने लिया हिस्सा

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प्रथम विश्व युद्ध के अंत तक 14 लाख भारतीय सैनिक रणभूमि में जुटे रहे। अविभाजित पंजाब जिसके विभाजन के बाद हरियाणा का जन्म हुआ के युवक बड़ी संख्या में इसमें शामिल हुए थे।
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74 ने खोई जान

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साल 1914 (जब युद्ध शुरू हुआ था) से 1921 के दौरान करीब 74 हजार भारतीय सैनिक शहीद हुए।

64,350 घायल

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प्रथम विश्व युद्ध में घायल हुए भारतीय सैनिकों की संख्या 31 दिसंबर 1919 तक 64,350 थी।
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3,762 लापता और गिरफ्तार

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31 दिसंबर, 1919 तक 3,762 सैनिक या तो लापता हो गए या उन्हें जेल भेजा गया।
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11 विक्टोरिया क्रॉस विजेता

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11 विक्टोरिया क्रॉस विजेताओं को चुना गया। यह आंकड़े अथॉरिटी ऑफ द गवर्मेंट ऑफ इंडिया द्वारा 1923 में पब्लिश किताब 'इंडियाज कॉन्ट्रीब्यूशन ऑन द ग्रेट वॉर' से और नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर आर्म्ड फोर्सिस हिस्टोरिकल रिसर्च से लिए गए हैं।
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भारत के लिए घातक हो गईं थी ब्रिटिश योजनाएं

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प्रथम विश्व युद्ध के दौरान न केवल भारतीय सैनिकों ने अपने युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया बल्कि भारत से भारी मात्रा में सामान युद्ध में लड़ रहे ब्रिटेन के सैनिकों तक पहुंचाया गया। बावजूद इसके ब्रिटेन की भारत में योजनाएं युद्ध के बाद और भी घातक होती चली गईं।

ये थे प्रमुख युद्ध स्थल

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पश्चिमी मोर्चा- लड़ाई की शुरुआत पश्चिमी मोर्चे से हुई थी। स्विस बॉर्डर से शुरू होकर लड़ाई फ्रांस और बेल्जियम तक फैल गई। इसी मोर्चे पर मुख्य लड़ाईयां हुईं। बेल्जियम में ही सैनिकों को खतरनाक जहरीली गैसों का सामना करना पड़ा। जर्मनी और मित्र राष्ट्रों ने भारी मात्रा में कई टन गैस का इस्तेमाल किया, जिसमें हजारों लोग मारे गए।

यहां मारे गए 1500 भारतीय सैनिक

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पूर्वी मोर्चा- पूर्वी मोर्चा में पश्चिमी एवं सेंट्रल यूरोप और मिडल ईस्ट शामिल थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान यहां हुई लड़ाईयों में बड़ी सेनाएं भी शामिल थीं। सेनाओं ने इस दौरान यहां अभियान चलाए और युद्ध रणनीतियां भी अपनाईं। यहां हुई लड़ाईयों में सबसे बड़ी लड़ाई गलीपोली में हुई लड़ाई मानी जाती है। इस लड़ाई में मित्र राष्ट्रों के सैनिकों को बेहद नुकसान हुआ।

आंकड़ों के मुताबिक गलीपोली में हुई लड़ाई में 15 हजार भारतीय सौनिक शामिल थे। इनमें से करीब 1500 सैनिक मारे गए थे। इसके अलावा इस मोर्चे में आने वाले कुत-अल-अमारा (जो मिडल ईस्ट में स्थित है) में मित्र राष्ट्रों के सैनिकों को पांच महीने तक बंदी बनाकर रखा गया था। यह सभी सैनिक चारों ओर से दुश्मनों से घिरे हुए थे, इन्हें खाने के लिए भी कुछ नहीं दिया गया था।

यहां हुआ महिलाओं और बच्चों का इस्तेमाल

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अफ्रीकी मोर्चा- यहां जितनी भी लड़ाईयां हुईं वह शाही उपनिवेशों के कारण हुईं। जिनमें से ईस्ट अफ्रीका में हुई लड़ाई सबसे लंबी थी।  युद्धविराम के लिए 11 नवंबर को यूरोप में संधि पर हस्ताक्षर किए गए। लेकिन बावजूद इसके ब्रिटेन और जर्मनी के सैनिक लड़ते रहे। इधर सबसे ज्यादा लड़ने वालों में अफ्रीकी और भारतीय थे। गोलाबारूद की आपूर्ति के लिए देशी वाहकों के तौर पर महिलाओं और बच्चों का इस्तेमाल हुआ। ईस्ट अफ्रीका में हुए युद्ध में 1 लाख मौतें हुईं। वहीं फ्रेंच नॉर्थ अफ्रीका और फ्रेंच वेस्ट अफ्रीका में 65 हजार मौतें हुईं।

यहां इन दो देशों के बीच हो गया था विवाद

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एशिया और पैसिफिक मोर्चा- यहां हुईं अधिकतम लड़ाईयों में नौसेना की लड़ाई शामिल थीं। इनमें सबसे बड़ी लड़ाई सिंगताओ की घेराबंदी कर हुई। यह एक जर्मन द्वारा नियंत्रित बंदरगाह था। लड़ाई के बाद सिंगताओ बंदरगाह ही जापान और चीन के बीच विवाद की वजह बना। बाद में सर्वोच्चता के लिए दोनों देश झुकते गए। जापान मित्र देशों की सेनाओं का ही भाग था, चीन ने मित्र देशों के सैनिकों की मदद के लिए हजारों की संख्या में श्रमिक भेजे। सिंगताओ विवाद इसलिए शुरू हुआ था क्योंकि चीन ने जून 1919 में वर्साय संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इस मुद्दे पर चीन में भी विरोध प्रदर्शन हुआ था।

ऐसी परिस्थियों में भेजे गए भारतीय सैनिक

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भारतीय सैनिक युद्ध में इसलिए शामिल हुए क्योंकि गरीबी के दौर में उन्हें इसके लिए सैलरी दी जा रही थी। उन्हें अंजान और अपरीचित देशो में भेजा गया, जहां से कई सैनिक कभी वापस नहीं लौटे। इन सैनिकों को न तो हथियार चलाने आते थे और न ही युद्ध के दौरान इन्हें किसी प्रकार की कोई छुट्टी दी गई। इन्हें बस एक फाइटिंग मशीन के तौर पर इस्तेमाल किया गया। इन्हें कोई सम्मान देने की बजाय खाली हाथ भारत भेज दिया गया। आज इस युद्ध को खत्म हुए पूरे 100 साल हो चुके हैं। हम इस मौके पर उन भारतीय सैनिकों को सलाम करते हैं, जिन्हें विश्व इतिहास ने भुला दिया है।

सैनिक, जानवर, सामान दिए थे भारत ने

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प्रथम विश्व युद्ध में लड़ने वाले भारतीय सैनिकों की बात तो हम कर चुके हैं। लेकिन भारत से केवल सैनिक ही नहीं बल्कि जानवर और सामान भी भेजे गए। भारत से इस लड़ाई में कुल 172,815 जानर भेजे गए थे-

- युद्ध में भारत से 85,953 घोड़े भेजे गए।

- युद्ध में भारत से 65,398 खच्चर भेजे गए।

- भारत की ओर से युद्ध में 5,061 बैल भेजे गए।

- भारत से युद्ध स्थलों पर 5,692 दूध देने वाले पशु भेजे गए।

- भारत की ओर से 10,781 ऊंट भी भेजे गए।

- भारत की ओर से युद्ध के विभिन्न स्थलों पर 369.1 मिलियन टन सामान की आपूर्ति की गई।

- युद्ध में भारतीय राजकोष से 146.2 मिलियन पाउंड दिए गए।
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