1000 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से हो रही खरीद
स्थानीय पशुपालक पंजाब के सीमावर्ती इलाकों से कर रहे खरीद
आने वाले दिनों में दामों में और इजाफा होने की संभावना
पशुपालकों के लिए सर्दी में चारा जुटाना रहेगा बड़ी चुनौती
संवाद न्यूज एजेंसी
ऊना। जिले में पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली तूड़ी के दाम इन दिनों बेलगाम तरीके से बढ़ रहे हैं। कुछ ही महीनों में तूड़ी के दाम 500 रुपये से बढ़कर 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं। इस बीच क्षेत्र में गेहूं की बिजाई शुरू हो चुकी है और नई तूड़ी तैयार होने में चार से पांच माह का समय लगेगा। ऐसे में पशुपालकों के लिए आने वाले दिनों में चारे की व्यवस्था करना चुनौती बन गया है। सामान्यत: इस मौसम में तूड़ी की कीमत 600 से 700 रुपये प्रति क्विंटल तक रहती थी, लेकिन इस बार भाव 1000 रुपये तक पहुंचने से पशुपालक चिंतित हैं कि आगे कीमतें और कितनी बढ़ेंगी। तूड़ी अब तक पशुओं के लिए सबसे सस्ता और सुलभ आहार मानी जाती थी, लेकिन इस बार इसकी कीमत में तेजी ने पशुपालकों को झटका दिया है। पशुपालक तरसेम लाल, विनोद कुमार, ऊषा देवी, सुनीता देवी, निर्मला, सोमनाथ, सुभाष चंद और प्रवीण कुमार का कहना है कि सर्दियों में हरी घास उपलब्ध नहीं होती, ऐसे में तूड़ी ही मुख्य आहार रहती है। उन्होंने बताया कि इन दिनों वे पंजाब से तूड़ी खरीदने के लिए मजबूर हैं। एक पशु का प्रतिदिन का खर्च करीब 400 रुपये तक पहुंच गया है, जबकि आय 300 रुपये के आसपास ही है। बरसात के मौसम में हरी घास के कारण तूड़ी की खपत कम होती है, पर सर्दी में इसका उपयोग प्रतिदिन होता है। पशुपालकों को आशंका है कि आने वाले दिनों में तूड़ी के दाम 1500 रुपये प्रति क्विंटल या इससे भी अधिक हो सकते हैं।
पंजाब से होती है तूड़ी की सप्लाई
वर्तमान में क्षेत्र में बेची जा रही अधिकतर तूड़ी पंजाब से सप्लाई की जा रही है। सीमावर्ती जिलों में गेहूं की कटाई के दौरान किसान बड़ी मात्रा में तूड़ी का स्टॉक कर लेते हैं और बाद में मांग बढ़ने पर इसे ऊंचे दामों पर बेचते हैं।
कटाई के बाद सालभर का स्टॉक रखें : अधिकारी
वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश भट्टी ने बताया कि तूड़ी ऐसा आहार है जिसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। उन्होंने सलाह दी कि पशुपालक गेहूं की कटाई के बाद ही सालभर की आवश्यकता के अनुसार तूड़ी अपने पास स्टॉक करें। इससे न केवल बाजार में कीमतों पर नियंत्रण रहेगा, बल्कि पशुपालकों पर आर्थिक बोझ भी नहीं बढ़ेगा।