ऊना। क्षेत्रीय अस्पताल ऊना में फोरेंसिक विशेषज्ञ का स्वीकृत पद लंबे समय से खाली होने के कारण संदिग्ध मौतों और अन्य संवेदनशील मामलों में मरीजों और पुलिस को मेडिकल कॉलेज टांडा का रुख करना पड़ रहा है।
फोरेंसिक विशेषज्ञ के अभाव में रोजाना औसतन तीन से चार मामले पोस्टमार्टम और विशेषज्ञ राय के लिए टांडा रेफर किए जा रहे हैं। अस्पताल में हर महीने करीब 50 से 60 पोस्टमार्टम किए जाते हैं।
हालांकि संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतों के मामलों में फोरेंसिक विशेषज्ञ की आवश्यकता होने पर शवों को मेडिकल कॉलेज टांडा भेजना पड़ता है। इससे पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने में समय लगता है, जिसका सीधा असर पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर पड़ता है।
रिपोर्ट आने के बाद ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो पाती है। क्षेत्रीय अस्पताल में चिकित्सकों के 38 स्वीकृत पद हैं, जिनमें फोरेंसिक विशेषज्ञ सहित चार मेडिकल ऑफिसर के पद रिक्त हैं। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि मेडिकल कॉलेज नहीं होने वाले जिलों में फोरेंसिक विशेषज्ञों की कमी के कारण ऐसी दिक्कतें लगातार बनी हुई हैं।
जांच में अहम होती है फोरेंसिक रिपोर्ट
विशेषज्ञों के अनुसार आपराधिक और संदिग्ध मामलों में फोरेंसिक जांच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। डीएनए, फिंगरप्रिंट और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर तैयार रिपोर्ट अदालत में साक्ष्य के रूप में उपयोग होती है और अपराध की गुत्थी सुलझाने में पुलिस की मदद करती है।
क्षेत्रीय अस्पताल में फोरेंसिक विशेषज्ञ का पद स्वीकृत है लेकिन अभी तक तैनाती नहीं हुई है। इसी कारण संदिग्ध परिस्थितियों के मामलों को पोस्टमार्टम और विशेषज्ञ राय के लिए मेडिकल कॉलेज टांडा भेजना पड़ता है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही संबंधित मामलों में अंतिम चिकित्सकीय राय दी जाती है। -डॉ. संजय मनकोटिया, चिकित्सा अधीक्षक, क्षेत्रीय अस्पताल ऊना