हरोली (ऊना)। ठाकुरद्वारा बढ़ेड़ा में श्रीमद्भागवत कथा के समापन पर कथावाचक अतुल कृष्ण महाराज ने जीवन के संतुलन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैसे वृक्ष की जड़ और तना एक ही इकाई के दो छोर हैं, वैसे ही संसार और परमात्मा अलग-अलग नहीं हैं। संसार के लिए न तो परमात्मा को छोड़ा जा सकता है और न परमात्मा की प्राप्ति के लिए संसार छोड़ना जरूरी है। हमारी दृष्टि अखंड होगी तभी समग्रता का अनुभव होगा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 80 साल पहले जन्म होता है। फिर 80 की उम्र में मृत्यु हो जाती है। दोनों में इतना लंबा फासला है कि हम समझ बैठते हैं कि जन्म अलग है और मृत्यु अलग। दोनों का एक साथ होना हमें असंगत लगता है, जबकि जन्म और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
अतुल कृष्ण ने कहा कि कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को भगवान की बहुत सारी बातें असंगत एवं विरोधाभासी लगती हैं। तब भगवान ने अपना विराट रूप दिखाकर समाधान किया। उन्होंने कहा कि जिसने सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया, उसके लिए दुख भी सुख बन जाता है। वहीं जिसने सब कुछ अपने हाथ में रखा, उसके लिए सुख भी दुख है।
कथा में उपस्थित संगत को उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के 16108 विवाह, सुदामा को ऐश्वर्य की प्राप्ति और परीक्षित मोक्ष का प्रसंग भी सुनाया। इस दौरान मनमोहक झांकियां भी निकाली गईं। कथा के पश्चात विशाल भंडारे का भी आयोजन किया गया। इस मौके पर प्रमुख रूप से श्रीश्री 1008 स्वामी यश गिरि जी महाराज, अनूप सिंह, चनण सिंह, प्रीतम सिंह, रमेश चंद, राकेश शर्मा, विरेन्द्र शर्मा, सुखविंद्र सिंह, सुरेंद्र कंग, देवराज, राजेंद्र कुमार, होशियार सिंह, मलकीत सिंह, सतीश शर्मा, सतनाम गिल उपस्थित रहे।