कहा- संसार में कोई विद्या हमें मृत्यु से नहीं बचा सकती
संवाद न्यूज एजेंसी
हरोली (ऊना)। यदि कर्म में परमात्मा की स्मृति बनी रहे तो हर पल पूजा बन सकता है। श्रीमद्भागवत कथा संसार के भटके हुए जीवों को किनारे लगाने वाला उत्तम साधन है। अपनी मृत्यु को देखकर असहाय हो चुके राजा परीक्षित को शुकदेव ने भागवत के बल पर सातवें दिन भगवान की दिव्य कृपा का बोध करा कर निश्चिंत बना दिया। जैसे भुने हुए बीज दोबारा अंकुरित नहीं होते, इसी प्रकार ईश्वर चिंतन करते हुए जिन्होंने अपने सभी कर्मों को दग्ध कर दिया है वे फिर इस भवसागर में नहीं आते। यह अमृत वचन श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस में परम श्रद्धेय अतुल कृष्ण ने ठाकुरद्वारा बढेड़ा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मनुष्य की वासनाएं ही हमें जीवन भर उलझनों की चक्की में पीसती रहती हैं। संसार में कोई ऐसी विद्या एवं साधन नहीं है जो हमें मृत्यु से बचा सके। इससे मनुष्य तभी बचता है जब उसके अज्ञान की निवृत्ति होकर प्रभु की महिमा का बोध हो जाए। अभिमान छोड़कर हमें इस जीवन का आदर करना चाहिए। जो लोग समय का आदर नहीं करते वे अपने भाग्य को ही ठोकर मार पतन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। प्रभु की भक्ति एवं ज्ञान में ही जीवन का समाधान है। आलस्य परमार्थ मार्ग का प्रबल शत्रु हैं। हमारी दुर्बलताएं ही हमारे पैर की बेड़ियां बनी हुई हैं। रविवार को कथा में भगवान श्रीकृष्ण की अनेक बाल लीलाएं, महारास, कंस-वध एवं रुक्मणि विवाह का प्रसंग सभी ने अत्यंत तन्मयता से सुना। इस अवसर पर अनेक मनमोहक झांकियां भी निकाली गईं।