गगरेट (ऊना)। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर गगरेट सवर्ण समाज ने विरोध जताते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी से नियमों पर पुनर्विचार करने की मांग उठाई है। समाज की ओर से शुक्रवार को उपमंडल दंडाधिकारी गगरेट के माध्यम से केंद्र सरकार, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नाम ज्ञापन सौंपा गया। इस दौरान यति सत्यदेवानंद सरस्वती भी समाज के सदस्यों के साथ मौजूद रहे।
समाज के सदस्यों ने कहा कि उच्च शिक्षा से जुड़े नए नियमों को लेकर शिक्षा जगत और समाज के विभिन्न वर्गों में चिंता है। उनका कहना है कि प्रस्तावित प्रावधानों से विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका है। उन्होंने केंद्र सरकार से नियमों के सभी पहलुओं की समीक्षा कर आवश्यक संशोधन करने अथवा इन्हें वापस लेने की मांग की।
ज्ञापन में कहा गया कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े बड़े फैसले केवल प्रशासनिक स्तर पर नहीं लिए जाने चाहिए। ऐसे निर्णयों से पहले शिक्षकों, विद्यार्थियों, शिक्षाविदों, अभिभावकों और समाज के प्रतिनिधियों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाना जरूरी है। समाज ने विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने की मांग भी उठाई।
गगरेट सवर्ण समाज ने भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा, इतिहास और वैदिक शिक्षा के संरक्षण एवं संवर्धन को शिक्षा नीति में उचित स्थान देने की मांग की। साथ ही शिक्षा व्यवस्था को अनावश्यक राजनीतिक एवं वैचारिक हस्तक्षेप से मुक्त रखते हुए विद्यार्थियों और शिक्षकों के हितों को प्राथमिकता देने की बात कही।
समाज के सदस्यों ने कहा कि शिक्षा देश के भविष्य की नींव है, इसलिए इससे जुड़े किसी भी नियम को लागू करने से पहले उसके दूरगामी प्रभावों का अध्ययन और सभी संबंधित पक्षों से पर्याप्त चर्चा आवश्यक है।
इस अवसर पर रिंकू ठाकुर, मनीष ठाकुर, साहिल जसवाल, बंटी जसवाल, रोहित जसवाल, गौरव जसवाल, संजू जसवाल, अजय शर्मा, विकास शर्मा, निशु जसवाल, निशान जसवाल, रजत शर्मा, मिक्की जसवाल, रजत जसवाल, संजीव ठाकुर, राजेश ठाकुर, अशोक सोंखला, अभिषेक ठाकुर, विनय ठाकुर, साहिल ठाकुर, आर्यन ठाकुर, सूरज ठाकुर, राजकुमार शर्मा और शुभम ठाकुर सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे।
समाज ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की स्वायत्तता और विद्यार्थियों-शिक्षकों के हितों को लेकर है। सदस्यों ने कहा कि शिक्षा से जुड़े ऐसे नियम, जिन्हें वे जनहित और शैक्षणिक स्वतंत्रता के विपरीत मानते हैं, उनके खिलाफ आवाज उठाना जारी रहेगा।