लठियाणी (ऊना)। सात समंदर पार नहीं, पर अपनी माटी से दूर रहते हुए भी प्रवासियों का परंपराओं से अटूट नाता देखने को मिला। रविवार को लठियाणी में यह नाता जीवंत होते हुए महसूस किया गया। अपनी कर्मभूमि में रहकर जन्मभूमि की संस्कृति को बनाए रखने का अनुपम उदाहरण गोविंद सागर झील के तट पर देखने को मिला, जहां प्रवासी समुदाय ने मां सरस्वती की मूर्ति का विसर्जन पूरी श्रद्धा और धूमधाम के साथ किया। गोबिंद सागर के किनारे मां शारदे के जयकारे गूंजते रहे।
विसर्जन यात्रा के दौरान मैहरे से लेकर लठियाणी रोड तक का दृश्य किसी लघु भारत जैसा प्रतीत हो रहा था। डीजे की धुनों और भंगड़े की थाप पर थिरकते बच्चों, महिलाओं और युवाओं के उत्साह ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं का जोश यह दर्शा रहा था कि वे भले ही अपने गृह प्रदेश से दूर हों, लेकिन उनकी संस्कार और धार्मिक आस्था की जड़ें आज भी उतनी ही गहरी हैं। यात्रा के समापन पर गोबिंद सागर झील के घाट पर वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच मां शारदे की प्रतिमा का विसर्जन किया गया। इस मौके पर प्रवासियों ने कहा कि उनकी संस्कृति ही उनकी पहचान है और वे अपनी आने वाली पीढ़ी को इन परंपराओं से जोड़े रखना चाहते हैं।