संवाद न्यूज एजेंसी
ऊना। स्वयं का जाना हुआ सत्य ही मुक्ति का अनुभव प्रदान करता है। इसी बोध की अवस्था का नाम है संन्यास। मृत्यु के सतत स्मरण से अमृत तत्व की उपलब्धि होती है। शरीर से तादात्म्य के कारण आत्मिक दिए के तले अंधेरा बना रहता है। उक्त वचन श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में परम श्रद्धेय अतुल कृष्ण महाराज ने अलैहड़, अंब में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि धर्म मुक्ति का आरोहण है। श्रद्धा की आंख और बुद्धि के अतिक्रमण से अद्वैत में प्रवेश हुआ जाता है। जब परिधि का विसर्जन करते हैं तभी केंद्र में पहुंच पाते हैं, परिधि संसार है और केंद्र परमात्मा।
अतुल कृष्ण महाराज ने कहा कि चित्त की शक्तियों का रूपांतरण परमात्मा के सारे भेद खोल देता है। शुद्धि एवं शून्यता से समाधि फलित होती है। निशब्द में ठहर जाना अंतस में बदलाव का सरल उपाय है। आज कथा में गजेंद्र मोक्ष, मत्स्य अवतार का प्रसंग, भगवान श्रीराम का चरित्र एवं त्रिलोकीनाथ पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का प्रसंग लोगों ने बड़ी श्रद्धा से सुना। इस अवसर पर प्रमुख रूप से कथा के मुख्य यजमान जोगिंदर कुमार शर्मा, भूषण शर्मा, अंकुश शर्मा, कमल किशोर शर्मा, कृष्ण लाल शर्मा, रिक्षित शर्मा, अनीश शर्मा, तिलक राज शर्मा, ओमप्रकाश, देवराज, अशोक शर्मा, अश्विनी शर्मा, विजय शर्मा सहित अन्य उपस्थित रहे।