चिंतपूर्णी (ऊना)।
देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है छिन्नमस्तिका मां चिंतपूर्णी का धाम। प्राचीन धर्मशास्त्रों में वर्णित है कि आदी शक्ति मां जगदंबा अर्थात मां पार्वती ने जब अपनी ही योगाग्नि में स्वयं को जला डाला तो मां के अंग जहां-जहां गिरे, वहीं पर शक्ति पीठ स्थापित हो गए। पौराणिक कथा के अनुसार जब देव-दानव संग्राम में राक्षस राज महाबली शुंभ-निशुंभ नामक दैत्यों ने आदी शक्ति मां चंडिका और काली रूपों का सामना करते समय अपने सेनापतियों चंड-मुंड के मां के हाथों मारे जाने पर रक्तबीज नाम के प्रसिद्ध राक्षसों का दल अपनी सेना में शामिल कर लिया।
इन राक्षसों को उनकी तपस्या से यह विचित्र वरदान प्राप्त था कि युद्ध में उनके रक्त के जितने भी कतरे बहकर जमीन पर गिरेंगे, उनसे उन्हीं की क्षमता वाले उतने ही रक्तबीज पैदा हो जाते थे। रण भूमि में पैदा इस विचित्र स्थिति से निपटने के लिए मां जगदंबा ने अपनी दो योगिनियों जया और विजया को आदेश दिया कि वे इन असुरों का रक्त धरा पर गिरने से पहले ही पी जाएं। इसके बाद आदी शक्ति मां जगदंबा ने अपने नव शक्ति रूपों में संग्राम किया। पूरी रण भूमि दैत्यों के शवों से पट गई।
इस दौरान रण चंडी नाच उठी। रक्तबीज का समूल नाश हो चुका था मगर फिर भी दोनों योगिनियों की रक्त पिपासा शांत न हो सकी। दोनों ही और रक्त की मांग करने लगीं। उनकी बेचैनी को देख कर मां भगवती ने स्वयं अपनी गर्दन धड़ से अलग कर ली। गर्दन धड़ से अलग होते ही रक्त की दो धाराएं फूट पड़ीं जिससे दोनों योगिनियों की रक्त पिपासा शांत हुई। अपने मस्तक को छिन्न करने पर मां भगवती छिन्नमस्तिका के नाम से ही जग में विख्यात हो गईं।