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दुख दृष्टिकोण पर निर्भर : अतुल

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अमर उजाला ब्यूरो
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अंब (ऊना)। ज्वार में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन कथा वाचक अतुल कृष्ण महाराज ने प्रवचनों से मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कहा कि अपने से पूरी-पूरी पहचान हो जाए तो जीवन सफल है। जब तक पहचान नहीं होती, तब तक भक्त और भगवान में दूरी बनी रहती है।

उन्होंने कहा कि जीवन यात्रा के अंतिम क्षण में टूटे-फूटे खेल-खिलौने देखकर निराशा ही हाथ लगती है। मनुष्य खो बैठता है बहुत कुछ पर पाता कुछ भी नहीं। वास्तव में संसार से अपेक्षा करना ही गलत है। यह परम सत्य है कि एक क्षण भी हम ईश्वर के बिना रह नहीं सकते। उन्होंने कहा कि कि हमारे हाथ में कुछ भी तो नहीं है। हमारे हाथ भी परमात्मा के ही हाथ में हैं। संसार में हमारा होना न होने जैसा है, हम स्वयं ही अपनी राह में रुकावट बने हुए हैं। भगवान की कृपा से ही माटी का मानव जीवन कंचन हो सकता है। सारे जगत का बोझ तो परमात्मा ने उठाया हुआ है पर हम व्यर्थ की चिंता कर मरे जा रहे हैं।
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अतुल कृष्ण महाराज ने कहा कि सारी दुनिया को देखकर अक्सर लोग यही कहते हैं कि संसार दुखों का महासागर है। इसमें चारों ओर दुखों के सिवाय कहीं कुछ भी नजर नहीं आता। यहां तक की हमारा शरीर भी कई व्याधियों का मंदिर है। इसमें रोग ही रोग हैं। परंतु ज्ञानीजन कहते हैं कि जीवन के संपूर्ण दुख हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर हैं। यदि हमारा दृष्टिकोण सही होगा तो सब कुछ हमें अनुकूल लगेगा। शनिवार को श्री नृसिंह अवतार, गजेंद्र मोक्ष, श्रीवामन अवतार, श्रीराम का पावन चरित्र एवं लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य की कथा सुनाई गई। इस अवसर पर भगवान की झांकियां भी निकालीं गईं।
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