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शिवबाड़ी में उमड़ा श्रद्धा का जनसैलाब

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ताड़ा महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि पर्व पर प्रस्तुति देते कलाकार। - फोटो : अमर उजाला
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अमर उजाला ब्यूरो
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गगरेट (ऊना)। क्षेत्र के ऐतिहासिक प्राचीन द्रौण शिवबाड़ी मंदिर में महाशिवरात्रि पर्व पर हजारों शिव भक्तों ने जलाभिषेक कर भगवान भोले नाथ का आशीर्वाद लिया। धार्मिक आस्था का प्रतीक शिवबाड़ी मंदिर में स्थापित शिवलिंग को बिल पत्र, पुष्प और जल का अभिषेक करने के लिए शिवभक्तों को घंटों तक अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा। भारी भीड़ एवं शिवभक्तों की लंबी कतारों से मंदिर द्वार तक पहुंचने के लिए लोगों को भारी मशक्कत का सामना करना पड़ा, लेकिन शिव भक्तों इन सभी मुश्किलों को दरकिनार कर शिव भोले के जयकारे लगाते हुए बिना थके मंदिर परिसर की ओर बढ़ते रहे। पुलिस के कड़े प्रबंधों के चलते माहौल शांतिमय बना रहा और पुलिस ने कानून व्यवस्था को बनाए रखा। मान्यता है कि यहां धरती के अंदर धंसी इस अद्भुत शिव पिंडी के दर्शनों एवं उस पर जलाभिषेक कर सच्चे मन से मन्नत मांगने वाले भक्तों को भोले नाथ कभी खाली हाथ नहीं भेजते। शिवबाड़ी मंदिर के मुख्य पुजारियों अजय शर्मा और अश्वनी शर्मा के अनुसार इस शिवरात्रि के महापर्व पर मंदिर की ओर से भक्तों की सुविधा के लिए पुख्ता प्रबंध किए गए थे। उन्होंने कहा कि पुलिस प्रशासन का भी इस अवसर पर शांति बनाए रखने के लिए विशेष सहयोग रहा। सभी शिव भक्तों ने कतार में लगकर अपनी बारी का इंतजार करते हुए भोले नाथ का आशीर्वाद प्राप्त किया। मंदिर में आए शिव शंकर के उपासकों धैर्य शर्मा, उदय शर्मा, तुषार, अतुल, विपुल ठाकुर, प्रणव, अपूर्व शर्मा, कौस्तुव शर्मा, विशाल पुरी, विकास शर्मा, दिनेश शर्मा, पंकज, राजीव गर्ग, संजीव के अनुसार ऐतिहासिक प्राचीन द्रौण शिवबाड़ी में शिवरात्रि के दिन स्थापित शिवपिंडी में एक आलौकिक शक्ति का आभास होता है। वैसे ही पूरा वर्ष मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं, लेकिन शिवरात्रि के दिन पूजा अर्चना करने का एक अलग ही महत्व है।
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शिवबाड़ी के जंगल की लकड़ी पर मुर्दों का हक
गगरेट (ऊना)। पांडव गुरु द्रोणाचार्य द्वारा निर्मित प्राचीन शिवबाड़ी मंदिर के चारों ओर घना जंगल है। इस जंगल की सबसे खास बात यह है कि इस जंगल की लकड़ी को मात्र शिवबाड़ी में ही जलाया जा सकता है। यहां के जंगल की लकड़ी को शव जलाने के कार्य में ही लाया जा सकता है या यूं कहें कि इस जंगल की हर डाली पर मुर्दों का ही हक है। मान्यता के मुताबिक इस जंगल की लकड़ी को जिस किसी ने भी यहां से बाहर ले जाने की कोशिश कि, उसका अनिष्ट हुआ है। बुजुर्गों के अनुसार एक बार लोगों के मना करने पर फौजी यहां से गुजरते समय अपने ट्रक में यहां से लकड़ियां भर कर ले गए थे। लेकिन कुछ ही दूर जाने पर उनके ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से सभी सवारों की मौत हो गई थी तथा शिवबाड़ी की लकड़ी उन्हीं की चिताओं को जलाने में काम आई थी। इस लकड़ी को शिवबाड़ी परिसर में रहने वाले साधु संत अपना भोजन बनाने या अलाव जलाने में प्रयोग कर सकते हैं। इस अलौकिक जंगल में बहुत से अनसुलझे रहस्य दफन हैं।
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