मेले के शुभारंभ पर मक्की से की जाती है भगवान विष्णु की अराधना
मान्यता के अनुसार झींगुर की आवाज से पता चलता था सायर आने का
झोटों की होती थी लड़ाई, राजा सभाचंद के शासन काल से हुआ था शुरू
योगेश शर्मा
अर्की(सोलन)। जिले का प्रसिद्ध राज्यस्तरीय सायरोत्सव वीरवार से शुरू होगा। सोलन जिला के अर्की में हर वर्ष अश्विन मास की सक्रांति सायर पर्व के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व बाघल क्षेत्र की प्राचीन परंपराओं से जुड़ा है। इस दिन सभी लोग रक्षाबंधन के अवसर पर बहनों द्वारा बांधी गई राखी को उतार कर प्रातः सूर्योदय से पूर्व गांव के नजदीकी जल स्रोतों के पास रख देते हैं और जल के रूप में विष्णु भगवान की अराधना मक्की का शिला को धूप-दीप के साथ की जाती है। तत्पश्चात लोग बावड़ी से शुद्ध जल लेकर परिवार के सभी सदस्यों को पिलाते हैं। इसी सक्रांति से लोग नई फसल के अन्न का भंडारण व इसका इस्तेमाल करते हैं।
बाघल रियासत के राजा सभाचंद के शासन काल से वर्ष 1643 ईस्वी में सायर मेले का आरंभ माना जाता है। उस समय इस मेले में झोटों की लड़ाई की परंपरा आरंभ की थी, लेकिन मौजूदा समय में माननीय न्यायालय के आदेशों के बाद अब केवल झोटा पूजन ही किया जाता है।
पौराणिक लोक मान्यताओं के अनुसार सायर आने की सूचना एक विशेष प्रकार के कीट (झींगुर) से मिलती है। वह अपनी आवाज में सायर आई-सायर आई का गीत सुनाकर लोगों को सायर पर्व के बारे में अवगत करवाता है। जब सायर संपन्न हो जाती है फिर यह कीट अपनी आवाज से सायर गई-सायर गई सुनाता है। सायर जहां एक ओर हर्षोल्लास का संदेशवाहक है, वहीं दूसरी ओर शरद ऋतु के आगमन का सूचक भी है।